राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान की खूब चर्चा हो रही है कि 75 साल का मतलब रिटायर हो जाना, लेकिन ये तो उनके शब्द हैं ही नहीं। वे तो आरएसएस के दिवंगत नेता मोरोपंत पिंगले के जीवन पर आधारित एक पुस्तक का विमोचन करते हुए उनके एक वक्तव्य का उल्लेख कर रहे थे।

स्पष्ट है कि इसके आधार पर यह कहना ठीक नहीं होगा कि संघ प्रमुख प्रधानमंत्री मोदी को कोई राजनीतिक संदेश दे रहे थे। वैसे भी यदि मोदी 75 साल के होने वाले हैं तो खुद मोहन भागवत भी। संघ प्रमुख ने मोरोपंत पिंगले का स्मरण करते हुए यह भी कहा कि जब आपको 75 साल का होने पर शाल ओढ़ाया जाए तो आपको रिटायर हो जाना चाहिए।

मोहन भागवत की ओर से जो कुछ कहा गया, उससे यह स्पष्ट नहीं होता कि वे किसके रिटायर होने को रेखांकित करना चाह रहे थे-राजनीतिक लोगों के अथवा गैर-राजनीतिक लोगों के। यह पहली बार नहीं है जब राजनीति से रिटायर होने की उम्र को लेकर कोई चर्चा छिड़ी हो। ऐसा पहले भी होता रहा है।

अतीत में कई नेता 75-80 के बाद स्वेच्छा से राजनीति से रिटायर भी होते रहे हैं। ऐसे अनेक नेता या तो समाजसेवा में जुटे अथवा अध्ययन में। अब ऐसे नेता दुर्लभ ही हैं। ऐसे नेताओं के उदाहरण अधिक हैं जो रिटायर होने का नाम नहीं लेते।

राजनीति अथवा जीवन के किसी अन्य क्षेत्र से रिटायर होने की कोई उम्र सीमा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। यदि व्यक्ति विशेष सक्रिय है, लोगों की आकांक्षाओं को पूरा कर पा रहा है और उसकी लोकप्रियता भी बनी हुई है तो वह अपना काम करते रह सकता है।

राजनीति और अन्य क्षेत्रों में ऐसे लोग हैं भी, जो 75-80 के बाद भी अपना काम सही तरीके से कर रहे हैं। इसके साथ यह भी सही है कि कुछ नेता ऐसे भी हैं, जो राजनीति अथवा सत्ता का मोह छोड़ नहीं पाते। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कई नेता राज्यपाल बने और फिर सक्रिय राजनीति में लौट आए।

इसी तरह कुछ नेताओं ने खुद की राजनीतिक सक्रियता कम करने के पहले परिवार के लोगों को आगे बढ़ाया। अपने देश में कई दल ऐसे हैं, जिनमें दूसरी-तीसरी पीढ़ी के बेटे-बेटियां, नाती-पोते आदि राजनीतिक रूप से सक्रिय और प्रभावी हो चुके हैं। ऐसा विकसित लोकतांत्रिक देशों में कम ही देखने को मिलता है।

यह तथ्य है कि अपने देश में परिवारवाद की राजनीति खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। इससे भी विचित्र यह है कि अब उसका बचाव किया जाने लगा है। वंशवादी राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं को पुष्ट करने का काम नहीं करती। अपने देश में 60 वर्ष से अधिक आयु के नेता भी युवा कहलाते हैं और राजनीति में युवाओं की वैसी भागीदारी नहीं, जैसी होनी चाहिए।