गृह मामलों की संसद की स्थायी समिति ने मिलावटी खाद्य पदार्थ बनाने-बेचने वालों को न्यूनतम छह माह की जेल के साथ 25 हजार रुपये के जुर्माने की जो सिफारिश की, उसे न केवल तत्काल प्रभाव से स्वीकार किया जाना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे लोगों पर वास्तव में शिकंजा कसा जाए। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि मिलावटी खाद्य पदार्थ बेचने वाले बेलगाम होते दिख रहे हैं।

ऐसे तत्व किस तरह लोगों की सेहत से खेल रहे हैं, इसका पता इससे चलता है कि करीब-करीब हर तरह के खाद्य पदार्थों में मिलावट होने लगी है। यह किसी से छिपा नहीं कि हाल के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में किस तरह मिलावटी खोया पकड़ा गया। मिलावट खोये के साथ दूध एवं अन्य पदार्थों की बड़े पैमाने पर बिक्री होती है, लेकिन संबंधित एजेंसियां आम तौर पर त्योहारों के समय ही चेतती हैं।

चिंता की बात केवल यह नहीं कि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता से समझौता किया जाता है, बल्कि यह भी है कि उनमें अखाद्य और यहां तक कि बेहद हानिकारक वस्तुएं मिलाई जाती हैं।

जैसे दूध, पनीर, खोये आदि में मिलावट की जाती है, उसी तरह मसालों, दालों, खाने के तेल आदि में भी अखाद्य चीजें मिलाकर उन्हें बेचा जाता है। अब स्थिति यह है कि दवाओं तक में मिलावट होने लगी है। सरकारें इससे अनजान नहीं हो सकतीं कि किस तरह खराब गुणवत्ता वाली और यहां तक कि नकली दवाएं बनाने वाले भी सक्रिय हैं।

मिलावटी या फिर नकली खाद्य पदार्थ, दवाएं आदि बेचने वाले लोगों की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचाने और उन्हें बीमार करने का काम जानबूझकर कर रहे हैं। चूंकि उनके खिलाफ कभी कठोर कार्रवाई नहीं होती, इसलिए उनका दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। इसका बड़ा कारण यह है कि अभी मिलावटी खाद्य पदार्थ बेचने वालों को छह महीने तक की सजा और एक हजार रुपये के जुर्माने का ही प्रविधान है। यह सजा भी मुश्किल से ही किसी को मिलती है।

एक ऐसे देश में जहां मिलावटी खाद्य पदार्थ बनाने और बेचने का काम बड़े पैमाने पर होता है, वहां, इस अपराध में किसी को मुश्किल से सजा मिलना सरकारी तंत्र की नाकामी का ही प्रमाण है। कहने को तो अपने देश में हर तरह के कानून बने हुए हैं। इनमें खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाले कानून भी हैं, लेकिन उन पर वास्तव में अमल कठिनाई से ही होता है।

जैसे खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकने में सफलता नहीं मिल पा रही है, वैसे ही सरकारी तंत्र अस्वास्थ्यकर भोजन की बिक्री को भी रोकने में नाकाम है। ढाबों में मिलने वाला भोजन और स्ट्रीट फूड प्रायः गुणवत्ता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, लेकिन जिन पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता से समझौता न होने पाए, वे निष्क्रिय ही अधिक दिखते हैं।