जागरण संपादकीय: नाकामी की पोल खोलता नदियों का प्रदूषण, राजनीति इच्छाशक्ति बढ़ाना होगा
सभी दल नदियों को प्रदूषण से मुक्त करने की बात करते हैं लेकिन इसके बाद भी वे प्रदूषित बनी हुई हैं। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है। नदियों में सीवरों और गंदे नालों का पानी बिना शोधित किए न जाने पाए यह देखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और उनके नगर निकायों की है लेकिन वे इसमें कोताही बरत रहे हैं।
संजय गुप्त। जलशक्ति मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई यह जानकारी निराश करने वाली है कि नदियों के प्रदूषण को दूर करने का काम सही तरह नहीं हो पा रहा है। यह स्वीकारोक्ति इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि एक लंबे समय से कहा जा रहा है कि नदियों में सीवरों का गैर शोधित पानी नहीं गिरने दिया जाएगा।
बीते दिनों संसद में दी गई जानकारी से यह पता चल रहा है कि सीवेज सिस्टम की खामी से नदियों को प्रदूषण मुक्त करने में बाधा आ रही है। 2014 में मोदी सरकार ने सत्ता में आने के साथ ही जब गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने का अभियान नए सिरे से शुरू किया और इसके लिए एक नई व्यवस्था बनाई, तब यह उम्मीद बंधी थी कि इस नदी को प्रदूषण मुक्त करने के साथ अन्य नदियों को प्रदूषित होने से रोकने में सफलता मिलेगी, लेकिन स्थिति यह है कि अभी गंगा को भी पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं किया जा सका है।
नदियों में सीवरों और गंदे नालों का पानी बिना शोधित किए न जाने पाए, यह देखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और उनके नगर निकायों की है, लेकिन वे इसमें कोताही बरत रहे हैं। इसी का नतीजा है कि अभी भी नदियों का प्रदूषण जारी है। इसका कारण यह है कि जहां सीवेज शोधन संयंत्र पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं, वहीं अनेक शहरों के गंदे नाले अभी तक इन संयंत्रों से नहीं जोड़े जा सके हैं।
दुनिया के अन्य देशों की तरह अपने देश में भी तमाम शहर नदियों किनारे बसे हुए हैं। समय के साथ नदियों के तट पर आबादी का घनत्व भी बढ़ रहा है। इस आबादी के एक बड़े हिस्से के पास सीवेज सिस्टम नहीं है, क्योंकि वह अनधिकृत कॉलोनियों में अधिक रहती है। इसके अलावा शहरों का जो सीवेज सिस्टम है, वह पुराना पड़ चुका है। समस्या इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि सीवेज सिस्टम पर्याप्त क्षमता के नहीं हैं। वे सीवरों का पूरा गंदा पानी शोधित नहीं कर पाते।
इसके चलते सीवरों का गैर शोधित पानी सीधे नदियों में जाता है। यह स्थिति महानगरों में भी है। पिछले दिनों दिल्ली में सत्ता बदलने के बाद से यमुना की सफाई पर खूब चर्चा हो रही है। चुनाव में यमुना का प्रदूषण एक राजनीतिक मुद्दा बन गया था। हालांकि आम आदमी पार्टी सरकार भी यमुना को साफ करने की बात करती थी, लेकिन वह नाकाम रही। इसका एक कारण राज्य और केंद्र सरकार का झगड़ा भी रहा। इस झगड़े की वजह से यमुना की सफाई प्राथमिकता नहीं बन सकी।
शायद ही कोई दल हो, जो नदियों को प्रदूषण से मुक्त करने की बात न करता हो, लेकिन इसके बाद भी वे प्रदूषित बनी हुई हैं। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है। नदियों के प्रदूषित होने का एक बड़ा कारण नगर नियोजन से संबंधित नौकरशाही का नकारापन भी है। नौकरशाही ने नदियों किनारे होने वाली अनियोजित बसाहट को रोकने में उदासीनता का ही परिचय दिया है। उन्होंने इसे लेकर सरकारों को आगाह भी नहीं किया।
नदियों के प्रदूषण में नौकरशाही की भूमिका पर कभी कोई ठोस चर्चा नहीं हुई। अच्छा हो कि सरकार इस पर कोई श्वेतपत्र लाए कि नदियां क्यों प्रदूषित हैं? श्वेतपत्र में इसका भी उल्लेख किया जाए कि जब नदियों किनारे बसाहट हो रही था, तब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी बढ़ती आबादी के लिए उपयुक्त सीवेज सिस्टम का निर्माण क्यों नहीं करा रहे थे?
यदि यह मान लिया जाए कि पहले इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आखिर इसका क्या मतलब कि अब भी ध्यान न दिया जाए। एक ऐसे समय जब केंद्र के साथ राज्य सरकारों की ओर से नदियों को साफ करने के दावे किए जा रहे हैं, तब सीवेज सिस्टम में सुधार न हो पाना, गंदे नालों का सीवेज शोधन संयंत्रों से न जुड़ पाना और इन संयंत्रों का पूरी क्षमता से काम न कर पाना चकित करता है।
अरबों रुपये सीवेज व्यवस्था को दुरुस्त करने में खर्च किए जा चुके हैं, पर यही तथ्य बार-बार सामने आता है कि यह व्यवस्था अपर्याप्त और असंतोषजनक है। सीवेज व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए बनाए गए कई सीवेज शोधन संयंत्र एक-दो साल चलने के बाद ही बंद हो जाते हैं।
आज उन अनेक शहरों की सीवेज व्यवस्था सही तरह काम कर रही है, जिनका निर्माण अंग्रेजों ने कराया था, लेकिन हमारे इंजीनियर हर किस्म के आधारभूत ढांचे का निर्माण इस तरह करते हैं कि वह दो-चार साल में ही कमजोर पड़ जाता है या अपर्याप्त साबित हो जाता है।
नदियों में प्रदूषण केवल सीवेज सिस्टम की खराबी से ही नहीं होता, बल्कि उद्योगों के अपशिष्ट जल से भी होता है। गंभीर बात यह है कि तमाम उद्योग अपने विषाक्त जल को शोधित करने के बजाय उसे रिवर्स बोरिंग कर जमीन में समाहित कर देते हैं। यह अपराध है, लेकिन उस पर रोक इसलिए नहीं लग रही है, क्योंकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के अधिकारी ऐसे उद्योगों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करते।
इसका नतीजा यह है कि उद्योग जानबूझकर भूजल को दूषित कर रहे हैं। यह दूषित जल भूगर्भ जल को विषैला करता है और अनेक बीमारियों का कारण बनता है। पंजाब में कैंसर के मामले बढ़ने के पीछे भूमिगत जल के प्रदूषण को ही माना जा रहा है। नदियों को प्रदूषण मुक्त करने वाली व्यवस्था तब सुधरेगी, जब शासन-प्रशासन के साथ आम जनमानस भी सचेत होगा।
सरकारी कर्मचारी और विशेष रूप से इंजीनियरों पर यह दारोमदार होता है कि वे बेहतर इंजीनियरिंग और गुणवत्ता वाले निर्माण कराएं, लेकिन इसमें शिथिलता ही देखने को मिलती है। यह किसी से छिपा भी नहीं, लेकिन इसके बाद भी इंजीनियरों को जवाबदेह बनाने और उन्हें उनके घटिया निर्माण के लिए दंडित करने का काम नहीं हो पा रहा है।
पिछले दिनों सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि सड़कों के निर्माण और डिजाइनिंग में खामी इसलिए देखने को मिल रही है, क्योंकि इंजीनियर उनका निर्माण सही तरह नहीं करते। यह हाल एनएचएआइ के इंजीनियरों के साथ अन्य सरकारी विभागों का भी है। आज जब हम संकल्प ले रहे हैं कि 2047 तक देश को विकसित बनाना है, तब यदि बेसिक इंजीनियरिंग में भी दक्षता हासिल नहीं की जा पा रही है तो यह शर्म की बात है।












