भारत का वो कप्तान जिसने टीम इंडिया को विदेशों में दिलाई पहली टेस्ट सीरीज जीत
भारतीय टीम के पूर्व कप्तान मंसूर अली खान पटौदी की गिनती देश के महान कप्तानों में होती है। उनकी कप्तानी में ही भारत ने विदेशों में अपनी पहली टेस्ट सीरी ...और पढ़ें

मंसूर अली खान पटौदी भारत के महान बल्लेबाजों और कप्तानों में गिने जाते हैं
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स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली। भारत ने विश्व क्रिकेट को एक से एक साहसिक खिलाड़ी दिए हैं। ऐसे खिलाड़ी जिन्होंने टीम को लड़ना सिखाया, उसको जीतना सिखाया। ऐसे ही एक खिलाड़ी का नाम है मंसूर अली खान पटौदी।
एक ऐसा खिलाड़ी जो अपनी दमदार बल्लेबाजी के साथ-साथ रणनीतिक कौशल के लिए जाना जाता था और इसलिए उनकी गिनती भारत के बेहतरीन और सफल कप्तानों में होती है। मंसूर अली खान पौटदी का पांच जनवरी 1941 को जन्म हुआ था।
मंसूर अली खान पटौदी को क्रिकेट की दुनिया में एक और नाम से जाना जाता था जो बताता है कि इस खिलाड़ी का क्या रुतबा था। उन्हें टाइगर पटौदी के नाम से भी जाना जाता है।
पटौदी के पास सिर्फ एक आंख की रोशनी थी और इसके बाद भी वह भारतीय क्रिकेट को नई दिशा देने और उसे नई ऊंचाइयों तक ले जाने में सफल रहे। इस खिलाड़ी की सबसे बड़ी सफलता ये है कि उनकी कप्तानी में ही भारत ने पहली बार विदेशों में टेस्ट सीरीज जीती। भारत ने पटौदी की कप्तानी में न्यूजीलैंड के खिलाफ उसके ही घर में टेस्ट सीरीज जीती थी।
राजघराने से नाता
मंसूर अली खान पटौदी बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान के पिता हैं। उन्हें क्रिकेट विरासत में मिला था। सैफ अली खान के दादा यानी इफ्तिखार अली खान पटौदी भी शानदार क्रिकेटर थे और उन्होंने दो देशों के लिए क्रिकेट खेला। वह भारत के अलावा इंग्लैंड के लिए भी खेले।
पोलो खेलते समय उनका निधन हो गया था और तब मंसूर सिर्फ 11 साल के थे। पिता के जाने के बाद मंसूर नवाब बन गए। मंसूरी ने अपनी पढ़ाई इंग्लैंड में भी की और इसी दौरान क्रिकेट भी खेले। पढ़ाई के दौरान विंचेस्टर कॉलेज में रिकॉर्ड 1068 रन बनाकर मंसूर सभी की नजरों में आ गए थे। ऑक्सफोर्ड में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया।
21 साल की उम्र में बने कप्तान
मंसूर को काफी कम उम्र में बड़ी जिम्मेदारियां मिली थीं फिर वो चाहे नवाब बनने की हो या भारत का कप्तान। बात साल 1962 की है। भारत की टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर थी। इस दौरे पर भारत की कप्तानी कर रहे नारी कॉन्ट्रैक्टर चोटिल हो गए तब मंसूर को कप्तानी मिली और तब वह 21 साल 77 दिन के थे।
वह उस समय भारत के सबसे युवा कप्तान बने थे। उनकी कप्तानी में भारत ने 1967-68 के न्यूजीलैंड दौरे पर जीत हासिल की और विदेशों में अपना परचम लहराया।
ऐसे गंवाई आंख
नवाब होने के बाद भी मंसूर की जिंदगी में परेशानियां कम नहीं थी। छोटी उम्र में पिता का साया उठ जाना बहुत बड़ी तकलीफ है। एक और तकलीफ उनको साल 1961 में मिली।
इस साल इंग्लैंड में कार चलाते हुए उनका एक्सीडेंट हुआ और मंसूर की दाहिनी आंख चोटिल हो गई। ये हादसा काफी गंभीर था, इतना गंभीर की उनकी दाईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई।
डॉक्टरों ने तो उनका क्रिकेट करियर खत्म बता दिया था, लेकिन मंसूर ने हार नहीं मानी और छह महीने आराम करने के बाद वापसी की। दिसंबर में उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया। इसके बाद भी मंसूर की बल्लेबाजी और फील्डिंग जबरदस्त थी।
ऐसा रहा करियर
मंसूर ने भारत के लिए 46 टेस्ट मैच खेले जिनमें छह शतकों की मदद से 2793 रन बनाए। उन्होंने कुल 40 टेस्ट में भारत की कप्तानी की। उनका औसत 34.91 का रहा। उनकी कप्तानी में भारत ने नौ मैचों में जीत हासिल की।

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