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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 05, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

लापता बच्चों पर सरकारों को फटकार

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Published: Tue, 05 Feb 2013 07:32 PM (IST)Updated: Tue, 05 Feb 2013 08:13 PM (IST)

नई दिल्ली। लापता बच्चों पर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने में विफल रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों ...और पढ़ें

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नई दिल्ली। लापता बच्चों पर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने में विफल रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि किसी को बच्चों की चिंता नहीं है। शीर्ष अदालत ने न्यायालय के समक्ष हाजिर होने के न्यायिक आदेश का पालन नहीं करने पर अरुणाचल प्रदेश, गुजरात तथा तमिलनाडु के मुख्य सचिवों को भी आड़े हाथ लिया और कहा कि वे अदालत के साथ खेल रहे हैं। न्यायालय ने इन सभी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करने की चेतावनी है।

चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर, जस्टिस एआर दवे और जस्टिस विक्रमजीत सेन की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने मंगलवार को मामले में हलफनामा दाखिल करने में विफल रहे केंद्र और राज्यों को अंतिम मौका देते हुए इस प्रकरण की सुनवाई 19 फरवरी के लिए स्थगित कर दी। बचपन बचाओ आंदोलन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने बताया कि रोजाना सैकड़ों बच्चे लापता हो रहे हैं। न्यायालय ने 17 जनवरी को गुजरात, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश, गोवा और ओडिशा के मुख्य सचिवों को पूर्व में जारी नोटिस का जवाब नहीं देने पर कारण स्पष्ट करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर पेश होने का निर्देश दिया था। गोवा और ओडिशा के मुख्य सचिव अदालत में पेश हुए जबकि अन्य नदारद रहे। मुख्य सचिवों के इस रवैये पर न्यायाधीशों ने गहरी नाराजगी व्यक्त की। अरुणाचल प्रदेश सरकार के वकील ने अपने मुख्य सचिव की पेशी से छूट की मांग की तो कोर्ट ने कहा कि वह उपस्थित क्यों नहीं हुए। क्या हमें गैरजमानती वारंट जारी करना पड़ेगा। एक निर्देश दिया गया था, जिसका उन्हें पालन करना था। वे इससे इन्कार नहीं कर सकते।

कोर्ट ने गुजरात और तमिलनाडु की इसी तरह की दलीलों पर कहा कि अगली बार हम गैर जमानती वारंट जारी करेंगे। आपको क्या लगता है? हम सिर्फ आदेश पारित करने के लिए आदेश देते हैं? पीठ ने कहा कि जहां तक अन्य राज्यों का सवाल है, हम उन्हें स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए आखिरी मौका दे रहे हैं। पश्चिम बंगाल सरकार के वकील की इस दलील पर कि स्टेट्स रिपोर्ट पर दिशानिर्देश नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि आप नींद से कब जागेंगे। आप इस मामले में पेश ही क्यों हो रहे हैं। कुछ ऐसी ही टिप्पणी कोर्ट ने दिल्ली सरकार पर की।

कोर्ट ने माना कि केंद्र शासित प्रदेशों में यह समस्या अधिक है। खंडपीठ ने कहा कि केंद्र सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एएस चंढोक सहित दो पैरवीकार हैं, लेकिन दोनों के बीच समन्वय का अभाव दिखता है। बाएं हाथ को पता नहीं कि दाएं हाथ में क्या है। कोर्ट ने केंद्र को इस मामले में सबसे बड़ा दोषी पाते हुए कहा कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? हमें उसे बुलाना चाहिए। कोर्ट ने चंढोक को अगली सुनवाई में महिला व बाल कल्याण, समाज कल्याण और गृह मंत्रालय की तरफ से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। एनजीओ की याचिका में कहा गया है कि देश में जनवरी 2008 से जनवरी 2010 के बीच 1 लाख 17 हजार बच्चे गायब हुए, जिनमें 41,546 अभी तक लापता हैं। इनमें ज्यादातर का अपहरण मानव तस्करी और बाल मजदूरी के लिए किया गया।

कहां चले जाते हैं बच्चे

-राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार देश में औसतन हर आठ मिनट में एक बच्चा गुम हो जाता है

-कुल लापता हुए बच्चों में 40 प्रतिशत की तलाश नहीं हो पाती

-अगस्त 2012 में खुद सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के तहत 2011 में देश भर में 60 हजार बच्चे लापता हुए

-इस जानकारी में सरकार ने यह भी माना कि इन 60 हजार बच्चों में 22 हजार को पता नहीं चला

-2011 में सबसे ज्यादा-12हजार बच्चे पश्चिम बंगाल में लापता हुए। इसके बाद मध्य प्रदेश में 7,797 और दिल्ली में 5,111

-महाराष्ट्र, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड और पंजाब ने लापता बच्चों का रिकार्ड ही उपलब्ध नहीं कराया

-देश में लापता बच्चों के बारे में न तो प्रभावी कानून है और न ही 'लापता' को परिभाषित किया गया है। इस कारण तमाम रिपोर्ट ही नहीं दर्ज हो पातीं

-लापता होने बच्चों में सबसे अधिक अपहरण का शिकार बनते हैं। 2011 में बच्चों के अपहरण के 33098 मामले सामने आए। ये 2010 के मुकाबले 24 फीसद ज्यादा थे

-बड़ी संख्या में बच्चों का अपहरण वेश्यावृत्ति, भीख मंगाने और बाल मजदूरी के लिए किया जाता है

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