यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 13, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
पते के लिए बाध्य नहीं किए जा सकते आरटीआइ कार्यकर्ता
सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून के तहत अहम जानकारी मांगने वालों की सुरक्षा के लिए सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया ...और पढ़ें

नई दिल्ली। सूचना का अधिकार (आरटीआइ) कानून के तहत अहम जानकारी मांगने वालों की सुरक्षा के लिए सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। उसने सरकारी महकमों से कहा है कि आरटीआइ कार्यकर्ताओं को अपना पता बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। अगर उन्होंने कोई पोस्ट बॉक्स नंबर मुहैया कराया है तो अधिकारी उसी पर आवेदक के साथ पत्राचार करें।
कार्मिक मंत्रालय ने केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों और विभागों को हिदायत दी है कि वे किसी आरटीआइ आवेदक को पता बताने के लिए मजबूर नहीं करें बल्कि पत्राचार के लिए उनके द्वारा दिए गए पोस्ट बॉक्स नंबर पर ही उनसे संपर्क करें। कलकत्ता हाईकोर्ट के गत वर्ष 20 नवंबर के एक फैसले के मद्देनजर कार्मिक मंत्रालय ने सरकारी विभागों को यह सलाह दी है। आरटीआइ कार्यकर्ता अभिषेक गोयनका की याचिका का निस्तारण करते हुए हाई कोर्ट ने कार्मिक सचिव को आदेश दिया था कि वे अदालत के आदेश की एक प्रति समस्त विभागों को प्रेषित करें ताकि अधिकारी आवेदक के निजी ब्योरे की गोपनीयता के लिए जरूरी कदम उठा सकें। दरअसल आरटीआइ कानून के तहत सरकारी विभागों से कोई भी जानकारी मांगने के लिए आवेदक को अपना पूरा ब्योरा भी देना होता है। कभी-कभार ऐसे आवेदकों का पता सार्वजनिक हो जाने पर उनकी सुरक्षा पर खतरा पैदा हो जाता है। इस पर अक्टूबर, 2013 को आरटीआइ कार्यकर्ता लोकेश बत्रा ने कार्मिक मंत्रालय से शिकायत की थी कि जन सूचना अधिकारी आवेदकों का निजी ब्योरे अन्य लोगों से साझा कर रहे हैं। इस बीच कलकत्ता हाई कोर्ट का आदेश भी प्रभावी हो गया। कार्मिक मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है, 'अगर आरटीआइ आवेदक ने पोस्ट बॉक्स नंबर दिया है तो अधिकारियों और आवेदक के बीच पत्राचार उसी के जरिये होना चाहिए। अधिकारी, आवेदक को पता बताने के लिए विवश नहीं कर सकते हैं।' उसने आगे स्पष्ट किया है कि अगर पोस्ट बॉक्स से संपर्क में दिक्कत पैदा हो रही हो तभी अधिकारी आवेदक से उसका निजी ब्योरा मांगने पर जोर दे सकते हैं बशर्ते अधिकारी उस ब्योरे की गोपनीयता सुनिश्चित रख सकें।
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