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टीचिंग का पैशन

जिस तरह एक कुम्हार कच्ची-गीली मिट्टी को अपने सुगढ़ हाथों से तराशकर एक खूबसूरत-सार्थक आकार दे देता है, कुछ वैसी ही भूमिका एक टीचर की भी होती है। टीचर के हाथों भी किसी भी व्यक्ति के बचपन से लेकर युवावस्था तक का जीवन संवारा जाता है। जिस देश के टीचर

By Rajesh NiranjanEdited By: Published: Tue, 01 Sep 2015 03:53 AM (IST)Updated: Tue, 01 Sep 2015 07:04 AM (IST)
टीचिंग का पैशन

जिस तरह एक कुम्हार कच्ची-गीली मिट्टी को अपने सुगढ़ हाथों से तराशकर एक खूबसूरत-सार्थक आकार दे देता है, कुछ वैसी ही भूमिका एक टीचर की भी होती है। टीचर के हाथों भी किसी भी व्यक्ति के बचपन से लेकर युवावस्था तक का जीवन संवारा जाता है। जिस देश के टीचर अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हैं, उस देश में कभी टैलेंट की कमी नहीं हो सकती। टीचर्स डे (5 सितंबर) के मौके पर अरुण श्रीवास्तव बता रहे हैं देश के लिए कितनी और क्यों महत्वपूर्ण है टीचर्स की भूमिका...

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चाहें राजनेता हों या एंटरप्रेन्योेर, एमएनसी में काम करने वाले एग्जीक्यूटिव्स हों या फिर सरकारी या निजी नौकरी कर रहे लोग..., हम सब को काबिल बनाने और उपलब्धियों तक पहुंचाने में हमारे टीचर्स का सबसे बड़ा योगदान रहता है। बचपन से लेकर युवावस्था तक की पढ़ाई के दौरान पचासों अध्यापक हमारी जिंदगी में आते हैं। इनमें से सब तो शायद याद नहीं रह पाते, लेकिन कुछ अपने अंदाज, अपनी कर्मठता, अपने समर्पण और स्टूडेंट्स के प्रति अपने लगाव के कारण हमारे दिलो-दिमाग में हमेशा के लिए जगह बना लेते हैं। उनकी सीख हमेशा हमारा मार्गदर्शन करती रहती है।

भूमिका है बड़ी

दूसरी नौकरियों की तरह एक टीचर को सिर्फ जॉब के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। उसके सरोकार कहीं ज्यादा संवेदनशील होते हैं। अगर वह अपनी भूमिका के प्रति थोड़ा भी लापरवाह है, तो फिर वह अपनी ड्यूटी के प्रति न्याय नहीं कर रहा। अगर वह अपने स्टूडेंट का मार्गदर्शन नहीं कर पाता, उन्हें दिशा नहीं दिखा पाता, तो फिर वह अपने काम को ईमानदारी से नहीं निभा रहा या फिर वह इस पेशे को लेकर उदासीन है।

साइकोलॉजी की समझ

माता-पिता के बाद किसी बच्चे को कोई समझ सकता है, तो वह टीचर ही है। वह बच्चे के मनोविज्ञान को बेहतर तरीके से समझ सकता है। कोई बच्चा क्या पसंद या नापंसद करता है, पढ़ाई के प्रति उसमें किस तरह रुचि पैदा की जा सकती है या कैसे वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकता है, इन सभी बातों को समझने की अपेक्षा एक टीचर से की जाती है।

उदासीनता नहीं, कर्मठता

टीचर को अपने पेशे की संवेदनशीलता को देखते हुए कभी भी टीचिंग के प्रति उदासीनता नहीं बरतनी चाहिए। हमारे देश में छोटे शहरों, कस्बों, गांवों के स्कूलों (खासकर सरकारी) में आमतौर पर कुछ को छोड़कर ज्यादातर टीचर्स की छवि टाइम पास करने या क्लास में न जाने की रहती है। दरअसल, उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होता कि उनके कंधे पर समाज और देश को बनाने-गढ़ने की कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। अगर वे गंभीरता से मनन करें, तो शायद अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाने से कभी परहेज नहीं करेंगे।

पढ़ाने के लिए रेगुलर पढ़ें

आमतौर पर स्कूलों से लेकर कॉलेजों-विश्वविद्यालयों तक यह भी देखा जाता है कि एक बार टीचिंग के पेशे में आ जाने के बाद अधिकतर टीचर खुद पढ़ने या अपडेट रहने पर ध्यान ही नहीं देते। ऐसे में वे एक जैसी बातें या नोट्स ही हर साल, हर क्लास में दोहराते नजर आते हैं। वे इस बारे में सोचते ही नहीं कि बदलते वक्त के साथ उन्हेें अपने स्टूडेंट्स को भी नई जानकारियां देने की जरूरत है। देश और दुनिया में जो बदलाव हो रहे हैं, उनसे कनेक्ट करके टीचर अपने विषय में स्टूडेंट्स की दिलचस्पी बढ़ा सकते हैं, उनमें जिज्ञासा की प्रवृत्ति विकसित कर सकते हैं। अगर कोई अध्याापक खुद ज्यादा से ज्यादा पढ़ने और अपनी जानकारी बढ़ाने में दिलचस्पी रखता है, तो नि:संदेह वह अपने स्टूडेंट्स के साथ इन्हें साझा करके उन्हें भी लाभान्वित कर सकता है।

बढ़ रही जरूरत

देश की विशाल युवा आबादी को देखते हुए टीचर्स की भूमिका और ज्यादा बढ़ रही है। माना जा रहा है कि 2030 तक हमारे यहां दुनिया के सर्वाधिक युवा होंगे और हमारा देश युवाओं के मामले में नंबर वन होगा। जाहिर कि उस समय जो युवा होंगे, अभी वे बच्चे होंगे। ऐसे में अध्यापकों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। इस भूमिका को समझकर और बच्चों का समुचित मार्गदर्शन कर टीचर उनके टैलेंट को पूरी तरह से निखार सकते हैं। आज के बच्चे जब होनहार, इनोवेटिव युवा के रूप में कामकाजी दुनिया में एंट्री करेंगे, तो देश को मजबूत और समृद्ध ही करेंगे।

हम सब में है एक टीचर

पूर्व राष्ट्रपति डॉ.एपीजे कलाम बहुत बड़े वैज्ञानिक थे, लेकिन वे बार-बार कहते थे कि उनका सबसे बड़ा पैशन टीचिंग ही है। अपने आखिरी समय में भी वे आइआइएम शिलांग के स्टूडेंट्स के बीच व्याख्यान दे रहे थे। हम किसी भी पेशे या रोजगार में हों, अपने बच्चोें और परिजनों को अपनी नॉलेज और अनुभव से लगातार बताते-सिखाते रहते हैं। जो देश जितना पढ़ा-लिखा होता है, वह उतना ही तरक्की करता है। ऐसे में देश को हर मामले में आत्मननिर्भर बनाने और समृद्धि की राह पर ले जाने के लिए जरूरी है कि हमारा हर नागरिक शिक्षित हो। इसके लिए जरूरी है कि देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को महसूस करते हुए हम अपने आसपास के जरूरतमंद बच्चों/लोगों को शिक्षित बनाने का प्रयास करें। अपने जैसे लोगों के पारस्परिक सहयोग से अभियान चलाकर भी पढ़ाई के प्रति जागरूकता फैला सकते हैं।

ऑनलाइन का उठाएं फायदा

आप किसी भी पेशे में हों। बहुत पैसे कमा रहे हों। अपना काम बहुत बढ़िया तरीके से कर रहे हों। पर मन में कहीं कोई कसक-सी है कि काश अपनी नॉलेज या स्किल किसी के साथ साझा कर पाते। आप अपनी यह मुश्किल यूट्यूब, फेसबुक, स्काइप, वीडयो कॉन्फ्रेंसिंग आदि की मदद से हल कर सकते हैं। आप छोटे बच्चों से लेकर बड़े बच्चों तक को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से गाइड कर सकते हैं। उन तक अपनी विशेषज्ञता का लाभ पहुंचा सकते हैं। फिर देर क्यों? आज ही पहल करें और जरूरतमंदों को पढ़ाकर, उनके टैलेंट को बढ़ाने/निखारने में मदद करके उन्हें आगे बढ़ाएं और मन का सुकून मुफ्त पाएं।

रटने नहीं समझने पर जोर


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