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    दूर की सोच रखती हूं- अनुष्का शर्मा

    By Edited By:
    Updated: Thu, 07 Nov 2013 11:49 AM (IST)

    महज 25 की उम्र में अनुष्का शर्मा अपने कदम परिपक्व शख्स की तरह रख रही हैं। एक ओर जहां वह विभिन्न जॉनर की फिल्में कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वह फिल्मों व अपने भविष्य के लिए स्मार्ट निवेश भी कर रही हैं। फिल्म प्रोड्यूसर बनने की दिशा में बढ़ा चुकी हैं वह अपने कदम।

    मुंबई। महज 25 की उम्र में अनुष्का शर्मा अपने कदम परिपक्व शख्स की तरह रख रही हैं। एक ओर जहां वह विभिन्न जॉनर की फिल्में कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वह फिल्मों व अपने भविष्य के लिए स्मार्ट निवेश भी कर रही हैं। फिल्म प्रोड्यूसर बनने की दिशा में बढ़ा चुकी हैं वह अपने कदम।

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    अनुष्का कहती हैं, मुझे टिपिकल हीरोइन बनकर नहीं रहना है, इसलिए अलग-अलग मिजाज व कलवेर की फिल्में कर रही हूं। 'बॉम्बे वेलवेट' में एक जैज सिंगर की भूमिका निभा रही हूं। फिल्म की कहानी 1950 और 1970 के दशक में उभरते हुए मुंबई की है। 'पीके' में किरदार से लेकर गेटअप तक सब बेहद अलग है। आमिर और सुशांत जैसे दो अलग-अलग उम्र और अनुभव से लैस कलाकारों के संग काम करना ही अपने आप में कमाल का अनुभव है।

    दरअसल हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं, जहां एक साथ कई चीजें करना मुमकिन है। वह प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भी जरूरी है। मैंने फिल्म 'एनएच 10' के जरिए फिल्म निर्माण में अपने कदम रख दिए हैं। इससे मेरी जिंदगी में एक और नया अध्याय जुड़ा है। फिल्म के हीरो का चुनाव अभी बाकी है।

    पढ़ें:एनएच-10 से प्रोड्यूसर बनीं अनुष्का

    मेरा मानना है कि हमें क्वॉलिटी फिल्मों को सपोर्ट करना चाहिए, जैसा जॉन अब्राहम कर रहे हैं। वह एक्टर के तौर पर विशुद्ध कमर्शियल फिल्में, तो प्रोड्यूसर के तौर पर गंभीर, लॉजिकल और स्वस्थ मनोरंजन से भरपूर फिल्में पेश कर रहे हैं। मैं भी अच्छी फिल्मों को सपोर्ट करना चाहती हूं। 'एनएच 10' का निर्देशन कर रहे नवदीप सिंह की 'मनोरमा सिक्स फीट अंडर' बहुत अच्छी फिल्म थी। 'एनएच 10' एक एक्शन-थ्रिलर है। इसकी शूटिंग दिसंबर से दिल्ली में शुरू हो जाएगी।

    मैं खुद को खुशकिस्मत मानती हूं, जो कॅरियर के शुरुआती दौर में ही बड़े सितारों, निर्देशकों के साथ-साथ लीक से हटकर रोल प्ले करने के मौके मिल रहे हैं। मैंने सोच समझ कर ही फिल्में चुनी हैं। कह सकते हैं कि मैं व्यक्तिवादी हूं। अफसोस की बात है कि अपने देश में व्यक्तिवादी होने को दोष माना जाता है। हमेशा यही सीख दी जाती है कि ऐसी बनो या वैसी बनो। कभी यह नहीं कहा जाता कि तुम जैसी हो, वैसी बनो। मैं खुशकिस्मत हूं कि बहुत ही संरक्षित जीवन मिला है मुझे। अपने फैसले लेने की आजादी मिली है। परिवार ने हर फैसले में मेरा साथ दिया, तभी मैं इस मुकाम तक आ सकी। मुझे वही फिल्में करनी हैं, जो इस समय मेरे लिए जरूरी हैं। यहां हमारे हर फैसले का नतीजा छह महीने या साल भर के बाद सामने आता है, लिहाजा दूरगामी सोच रखना बहुत जरूरी है।'

    (सप्तरंग टीम)

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