'दास्तान- ए- मोहब्बत' को आमिर का सलाम
राघवेंद्र दुबे/कमल नयन,गहलौर घाटी ( गया)। उत्तरमेघ (कालिदास) के एक श्लोक में यक्ष कहता है- 'जब मैं पत्थर पर गेरू से तुम्हारी रूठी हुई मूर्ति के चित्र में, तुम्हें मनाने के लिए,खुद को तुम्हारे पैरों पर गिरा दिखाने चलता हूं, तो आंसू इस तरह उमड़ पड़ते हैं कि तुम्हें आंख भर देखने भी नहीं देते।'
[राघवेंद्र दुबे/कमल नयन],गहलौर घाटी ( गया)। उत्तरमेघ (कालिदास) के एक श्लोक में यक्ष कहता है- 'जब मैं पत्थर पर गेरू से तुम्हारी रूठी हुई मूर्ति के चित्र में, तुम्हें मनाने के लिए,खुद को तुम्हारे पैरों पर गिरा दिखाने चलता हूं, तो आंसू इस तरह उमड़ पड़ते हैं कि तुम्हें आंख भर देखने भी नहीं देते।'
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दशरथ मांझी की मोहब्बत इससे अलग है। उनकी प्रेम संवेदना बड़े सरोकार और सब कुछ पूरी तरह बदल देने के जुनून में रचनात्मकता की आसमान छूती उंचाई पा जाती है। इस प्रेम कथा में इतनी ताकत तो है कि वह आज के नव उदारवादी दौर के मानदंडों और छवियों से न केवल टकरा सके,उसे बदल भी सके।
अभिनेता और निर्देशक आमिर खान को दशरथ मांझी के इसी जुनून, पहाड़ से टकरा जाने वाली 'हिम्मत' और 'वन मैन आर्मी' मिजाज ने बहुत प्रभावित किया। वे मंगलवार 25 फरवरी दोपहर दो बजे यहां पहुंचे। वे 22 फरवरी को ही आने वाले थे लेकिन, कुछ कारणों के वजह से उनका यहां आना दो दिन टल गया। वे आए तो सबसे पहले दशरथ मांझी की समाधि पर पहुंचे, झुक कर दोनों हाथों से उसका स्पर्श किया, लाल गुलाब चढ़ाए और देर तक हाथ जोड़े खड़े रहे। यह 'दास्तान- ए-मोहब्बत' के लिए उनका सलाम था। सुबह साढ़े सात बजे गीतों की मौजूदगी में उन्होंने हवा की ठंडक महसूस की। 22 साल में अकेले पहाड़ काट कर उसके बीच से 22 फुट की सड़क निकाल देने वाले दशरथ मांझी ने प्रेम के उस एकदम अलहदा रास्ते की खोज की, जहां शब्दों की कोई जरूरत नहीं होती। इसलिए गीत भी नि:शब्द थे।
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ललछौंह पहाड़ियां अलग- अलग रंग बदल रहीं थीं और शक्ल भी। साथी दिखा रहा था कोई जैसे यूनानी योद्धा, कोई समाधिस्थ योगी, कहीं प्रेमाकुल गजराज। सुबह की धूप पहाड़ पर बांधने वालों मुहावरों, छंदों से एक दम मुक्त और सतह खोलने वाली थी। जाहिर है पहाड़ की हर सतह में दशरथ मांझी की प्रेम कथा के अलग -अलग चैप्टर भी थे।
'सुबह साढ़े नौ बजे तक हम आस-पास की खासी दूरी तक घूम आए थे। झोपड़ी के आगे बैठी केहुनी की मैल ईंट के टुकड़े से रगड़ती औरत, सुग्गे का पिंजरा सामने रख कर छिपा में भात सानता आदमी, आती- जाती गाड़ियों से उठी धूल में नाचते अधनंगे बच्चे और ताड़ के कच्ची उम्र पेड़ों पर दूर -दूर तक सूखने के लिए पसारी गई कथरी, साड़ी और जाने क्या- क्या। औरतों की एक पंचायत में आज सबसे बड़ा मुद्दा मिट्टी तेल न होने के कारण ढिबरी न जला पाने और मड़ई में अंधेरा रह जाने का था।
साढ़े 12 बजे तक यहां बड़ा हुजूम जुट गया था। रास्ते में दस- बारह लड़के धीमी दौड़ लगाते घाटी की ओर बढ़ रहे थे। एक के मोबाइल पर बज रहा था- 'बार- बार हां, बोल यार हां/ अपनी जीत हो उनकी हार हां, कोई हमसे जीत न पावे चले चलो..' (फिल्म लगान)। गाड़ी रोक कर पूछ लेता हूं तो पता चला उन्होंने यह गाना कल ही लोड कराया। गहलौर घाटी में नजर जाती है पहाड़ की चोटी पर। तकरीबन 500 फुट ऊंची चोटी तक पर लड़के चढ़े हुए हैं। पुलिस वाले लोगों की रेवड़ हांक रहे हैं।
एक पुलिस अफसर ने बताया-देखिए..स्टार वैल्यू का आदमी आ रहा है। जाहिर है लोगों में एक्साइटमेंट जनेरेटर होगा..लोग चिल्लाएंगे, उनके पास आना चाहेंगे, उन्हें छूना चाहेंगे। फिर यह लेफ्ट विंग इक्स्टीमिस्ट का इलाका है।
इसलिए दो दिन पहले ही पूरे इलाके को सेनेटाइज और कंसील कर दिया गया है। लोगों की जुटान बढ़ती जा रही थी। आखिर दोपहर दो बजे दस- बारह पुलिस गाड़ियों के बीच आमिर यहां पहुंचे। भीड़ के बीच, उसका भारी दवाब महसूस करते हुए भी उनके चेहरे पर चुंबकीय मुस्कराहट थी। उन्होंने लोगों का अभिवादन स्वीकार किया और मुमकिन हद तक लोगों से मिले भी। चेहरे पर थोड़ी भी शिकन नहीं आई। भीड़ अनियंत्रित हो जाने की ही वजह से वह दशरथ मांझी की समाधि तक पहुंचने के पहले कुछ देर के लिए ओबी वैन में जाकर बैठ गए। जब उनके लिए किसी तरह रास्ता बन सका तो वैन से बाहर आए।
प्रेस वार्ता उसी 22 फुट चौड़ी सड़क पर की जो दशरथ मांझी के पहाड़ काटने से संभव हो सकी। कुछ लोगों से बातचीत होती है। एक ने कहा- स्क्रीन पर उसके फ्रेम में दशरथ मांझी की कहानी जाहिर है एक खास क्लास के लिए क्रिस्पी यानी कुरकरी और थोड़ी मसालेदार भी हो जाएगी। लोग अनुमान लगा रहे थे और जैसा कि आमिर का इशारा भी था- दशरथ मांझी का जुनून एपिसोड की थीम का आधार होगा और अमिर लोगों को इसके ही जरिए जागरूक बनाएंगे। ऐसी जुनून से अपनी और कौम की तकदीर कैसे बदल जाएंगी यही आमिर बताएंगे। यानी रचनात्मकता ओर विकास की बात होगी। लेकिन आमिर इस संवाददाता के इस सवाल का जवाब टाल गए- दास्ताने मोहब्बत विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ बड़ा हथियार होती है या नहीं। वह मुस्कराते रहे और निकल गए। यह जवाब भी नहीं मिला कि सत्यमेव जयते सीजन दो क्यों लोकसभा चुनाव से एन पहले।
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