रिजवान अंसारी। हम नए साल में प्रवेश कर चुके हैं। अमूमन ऐसे वक्त में लोग नए साल की आमद की खुशी में जश्न की तैयारी में होते हैं। लेकिन दिसंबर का पूरा महीना बेहद तनाव भरा रहा। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में देश भर में ¨हसक विरोध-प्रदर्शन तो हुए ही, देश लगभग दो धड़े में बंटता हुआ भी दिखा। चिंताजनक यह है कि धर्म इस बंटवारे का आधार बनता हुआ प्रतीत हुआ। यानी हमारे सामने चुनौती इस बात की है कि कैसे इस नए साल में सांप्रदायिक और सामाजिक सद्भाव को कायम रखा जाए और देश की तरक्की में हाथ बंटाया जाए। कहने की जरूरत नहीं कि ¨हसक विरोध-प्रदर्शन की आड़ में कुछ लोगों द्वारा सोशल मीडिया के जरिये माहौल को हंिदूू-मुस्लिम बनाने की खूब कोशिश हुई। लेकिन दोनों समुदाय की समझदारी ने इन नापाक मंसूबों को नाकाम किया।दरअसल सांप्रदायिक सौहार्द भारत की एक महान प्रकृति है।

भारत ने दुनिया में सांप्रदायिक एकता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण स्थापित किया है। भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां सभी धर्म और विश्वास के लोग लंबे समय से शांतिपूर्वक रह रहे हैं। भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी और बहु-नस्लीय देश है। जाहिर है कई मामलों में यहां विविधता विद्यमान है।इतिहास गवाह रहा है कि समाज में जब भी सद्भाव का माहौल रहा है, देश और समाज में तरक्की हुई है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में सभी धर्म एकजुटता से लड़े। अंग्रेजों के आने से पहले देश में सांप्रदायिक दंगे कभी नहीं देखे गए थे। दूसरे शब्दों में कहें तो अंग्रेजों की फूट डालो की नीति के बाद ही देश को सांप्रदायिक दंगे का दंश ङोलना पड़ा। यानी तभी से धर्म और राजनीति का घालमेल प्रारंभ हो गया।

अगर मौजूदा वक्त में यह कहा जाए कि सामाजिक सद्भाव या सांप्रदायिक सौहार्द का रास्ता राजनीति से होकर जाता है तो कहना गलत नहीं होगा। क्या यह कहना गलत होगा कि देश के राजनेता अक्सर ही धार्मिक मुद्दों पर अनर्गल बयान देकर स्थिति को तनावपूर्ण करते आए हैं? इन सबकी वजह यह है कि भारत में धर्म एक भावनात्मक मुद्दा है। इतिहास में चाहे कुछ भी हुआ हो, मौजूदा वक्त में दुनिया के 10 शीर्ष विकसित देशों को ही देखें तो वहां धर्म कभी भी मुद्दा नहीं होता। नागरिकों को मूल सुविधाएं कैसे मुहैया हो सके, यह हमेशा सवालों में रहता है। शायद इसलिए उनकी जीवनशैली उत्तम होती है और यही कारण है कि वे एक विकसित देश हैं। ऐसे में सामाजिक सद्भावना को कायम करने की सियायी दलों की अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही तो है ही, हमें भी व्यक्तिगत तौर पर भरसक कोशिश करने की जरूरत है।लिहाजा इस नए साल में हमें एक नए संकल्प के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।

हमारा एक संकल्प न केवल हमारे समाज की मौजूदा सूरत को बदल सकता है, बल्कि देश को वैभव के शिखर पर लेकर जा सकता है। एक ऐसे समय में जब दुनिया भर में अपनी संस्कृति को संरक्षित करने की लड़ाई लड़ी जा रही हैं, तब हम अपनी भारतीय संस्कृति को यूं ही बिखरने नहीं दे सकते। हमारा एक संकल्प देश की विविधता को, उसकी खूबसूरती को कायम रखने में सहायक हो सकता है। हमारा संकल्प न केवल मानवता के नजरिये से हमें सोचने पर मजबूर करेगा, बल्कि हमारी अगली पीढ़ियों के जीवन को भी सुरक्षित करेगा। बहरहाल हमें सियासत से परे और नफे-नुकसान वाली सोच को अलग रख कर देश-समाज के बारे में सोचने की जरूरत है जिससे न केवल हमारी सदियों पुरानी संस्कृति महफूज रहेगी, बल्कि एक स्वस्थ समाज में सांस लेने का मौका भी नसीब होगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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