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    राज्य सरकार ने स्वास्थ्य साथी प्रकल्प की 90 प्रतिशत बकाया राशि का किया भुगतान

    By Jagran NewsEdited By: Ashisha Singh Rajput
    Updated: Fri, 28 Oct 2022 06:05 PM (IST)

    केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना की तर्ज पर बंगाल में स्वास्थ्य साथी प्रकल्प मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुरू किया था। इसके तहत साल में पांच लाख रुपये तक की चिकित्सा सुविधा दी जा रही है। साथ ही सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा के मामले में भी इसे बाध्यतामूलक किया गया।

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    इसके लिए 2,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिनमें से 1,400 करोड़ बकाया चुकाने में खर्च कर दिए गए

    कोलकाता, राज्य ब्यूरो। राज्य सरकार ने 'स्वास्थ्य साथी' प्रकल्प के तहत निजी अस्पतालों की 90 प्रतिशत बकाया राशि का भुगतान कर दिया है। सूत्रों से यह जानकारी मिली है। चालू वित्त वर्ष में स्वास्थ्य साथी प्रकल्प के लिए राज्य सरकार की ओर से 2,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिनमें से 1,400 करोड़ रुपये का बकाया का भुगतान करने में खर्च कर दिया गया। गौरतलब है कि निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों का स्वास्थ्य साथी प्रकल्प के तहत इलाज नहीं करने के मामले सामने आ रहे थे।

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    क्या कहना है निजी अस्पतालों

    निजी अस्पतालों का कहना था कि राज्य सरकार उनकी बकाया राशि का भुगतान नहीं कर रही है। इसी कारण वे इस प्रकल्प के तहत मरीजों का इलाज नहीं कर पा रहे हैं। इस पर राज्य सरकार की ओर से सफाई देते हुए कहा गया था कि मेडिकल बिल की जांच किए बिना रुपये का भुगतान कैसे किया जा सकता है? अब पता चला है कि 90 प्रतिशत बकाया धनराशि का भुगतान कर दिया गया है।

    बंगाल में 'आयुष्मान भारत' योजना

    गौरतलब है कि केंद्र सरकार की 'आयुष्मान भारत' योजना की तर्ज पर बंगाल में स्वास्थ्य साथी प्रकल्प मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुरू किया था। इसके तहत साल में पांच लाख रुपये तक की चिकित्सा सुविधा दी जा रही है। राज्य सरकार की ओर से लगाए जाने वाले 'दुआरे सरकार' शिविर से स्वास्थ्य कार्ड के लिए आवेदन किया जा सकता है।

    मुख्यमंत्री ममता की चेतावनी

    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कुछ समय पहले स्वास्थ्य साथी प्रकल्प के तहत इलाज नहीं करने वाले स्वास्थ्य संस्थानों को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा था कि बहुत से नर्सिंग होम इसकी अनदेखी कर रहे हैं। सरकारी प्रकल्प को मान्यता देनी ही होगी अन्यथा उनका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। इसके साथ ही सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा के मामले में भी इसे बाध्यतामूलक किया गया है।

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