उत्तराखंड की इस अनोखी रामलीला ने पूरे किए 122 साल, कई वर्षों तक राम की जगह वासुकी नाग देवता का हुआ राजतिलक
उत्तरकाशी के गोरशाली गांव की 122 साल पुरानी रामलीला ने एक अनोखी परंपरा निभाई है। टिहरी रियासत के प्रतिबंध के कारण कई वर्षों तक भगवान राम के बजाय गांव ...और पढ़ें

गोरशाली गांव की रामलीला में राम, लक्ष्मण व सीता के पात्र। स्रोत रामलीला समिति
जागरण संवाददाता, उत्तरकाशी: टिहरी रिसायत से शुरू हुई भटवाड़ी तहसील के गोरशाली गांव की रामलीला ने 122 वर्षों का स्वर्णिम सफर पूरा कर लिया है। इस रामलीला की खास बात ये है कि राजा के प्रतिबंध के चलते यहां कई वर्षों तक भगवान राम के पात्र नहीं, बल्कि गांव के ईष्ट वासुकी नाग देवता का राजतिलक किया जाता रहा।
हालांकि राजशाही खत्म होने के बाद से अब देवता की डोली के साथ राम के पात्र का ही राजतिलक किया जाता है। इस रामलीला में ग्रामीण पूरे उत्साह व परंपरा के साथ रामलीला का मंचन करते हैं।
बता दें कि जनपद मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर गोरशाली गांव रामलीला की शुरूआत 1904 में हुई थी, तब तत्कालीन टिहरी रियासत के गुप्तचरों ने राजा तक इसकी सूचना दी। बताया जाता है कि गुप्तचरों ने राजा को बताया कि गोरशाली गांव में रामलीला का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें टिहरी रियासत के राजा के बजाय भगवान राम के पात्र का राजतिलक किया जाता है।
इसके बाद राजा ने गांव की रामलीला पर प्रतिबंध लगाने का फरमान जारी कर दिया। कुछ समय बाद गांव के दो बुजुर्गों अवि सिंह व मातबर सिंह चौहान ने कारोबारी राधा बल्लभ तथा घनानंद खंडूड़ी के माध्यम से टिहरी रियासत के राजा तक पैरवी की और क्षमा याचना के बाद रामलीला पर लगे प्रतिबंध को हटवाया।
राजा ने ताम्र पत्र देकर रामलीला को मान्यता दी और ग्रामीणों को राजतिलक गांव के ईष्ट वासुकी नाग देवता का करने की बात कही। तब से यह परंपरा जीवित है। दोपहर के समय होने वाली रामलीला में मंचन के साथ-साथ 21 दिनों तक राम कथा, हनुमान चालीसा, कर्मकांड, अनुष्ठान आदि होता है।
रामलीला की शुरूआत मंगसीर की दीपावली के दूसरे दिन ध्वजा फहराकर होती है। रोजाना सुबह प्रभात फेरी में मंगला चरण के बाद दोपहर में व्यास पीठ से राम कथा का प्रवचन के बाद रामलीला का मंचन किया जाता है।
300 से ज्यादा परिवार वाला यह गांव इस अनुष्ठान में शामिल होता है। चारधाम विकास परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष व ग्रामीण सूरत राम नौटियाल ने बताया कि यहां 21 दिनों तक समिति के लोग व पात्र वर्णित रह कर एक समय भोजन कर मंदिर में ही रहते हैं।
गांव के आलम सिंह चौहान की ओर से चलाई गई मुहिम को लोगों ने आज भी जीवित रखे हुए है। गांव के बुजुर्ग मदन सिंह राणा, अब्बल सिंह बताते हैं कि रियासत काल में शिकारी व लकड़ी के कारोबारी अंग्रेज फेडरिक विल्सन ने गोरशाली की रामलीला की तारीफ सुनी और उन्होंने 1914 मे हर्षिल में ग्रामीणों से रामलीला का मंचन करवाया और प्रसन्न होकर समिति को 100 स्वर्ण मुद्राएं ईनाम में दी थी।
अब वासुकी नाग डोली के सम्मुख राम को पहनाया जाता है मुकुट
श्री वासुकीनाग देवता मंदिर पुनरोत्थान एवं पर्यटन समिति के अध्यक्ष सुभाष नौटियाल ने बताया कि 76 साल पहले राजशाही हटने के बाद से ईष्ट वासुकी नाग की डोली के सामने ही राम के पात्र को मंत्रोच्चार के साथ मुकुट पहनाया जाता है।
हालांकि पहले तक राजशाही की वजह से राजतिलक का मुकुट ईष्ट वासुकी नाग देवता का होता आया। गांव के बुजुर्ग तो ये भी बताते हैं कि राजशाही होने की वजह से रावण का वध भी मंच से नहीं किया जाता था। हालांकि अब राजशाही हटने की वजह से सभी तरह का मंचन होने लगा है।
गोरशाली गांव में इस वर्ष रामलीला का मंचन 14 दिसंबर से चल रहा है, जो कि 21 दिनों तक पूरे उत्साह के साथ आयोजित होगा। इस दौरान ग्रामीण प्रतिदिन सुंदरकांड और दैनिक पूजा, हवन आदि भी पूरे मनोयोग से करते हैं। ये परंपरा 100 वर्षों से भी ज्यादा से समय से चलती आ रही है, जिसे ग्रामीण पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाने का काम करते आ रहे हैं।
-धर्मेंद्र सिंह राणा, रामलीला समिति गोरशाली, उत्तरकाशी।
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