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    मौत के मुहाने पर झूला पुल, तार पर झूलती जिंदगी

    By BhanuEdited By:
    Updated: Mon, 17 Jul 2017 05:19 PM (IST)

    पिथौरागढ़ की गोरी नदी घाटी में दर्जनों गांवों के लोग अपनी जिंदगी पर खेलते हुए नदियों को पार करते हैं। ...और पढ़ें

    मौत के मुहाने पर झूला पुल, तार पर झूलती जिंदगी

    पिथौरागढ़, [जेएनएन] मौत के मुहाने पर पुल और तार पर झूलती जिंदगी। ये बात बिल्कुल सटीक बैठती है पिथौरागढ़ की गोरी नदी घाटी में बसे लोगों पर। अब भले ही नेपाल और चीन सीमा से लगे सीमांत क्षेत्रों में विकास पहुंचाने के लंबे-चौड़े दावे होते हैं। हर कोने तक विकास पहुंचाने के वादे होते हैं, लेकिन इन दावों-वादों की पोल उसवक्त खुलकर सामने आ जाती है जब यहां बसे दर्जनों गांवों के लोग अपनी जिंदगी पर खेलते हुए नदियों को पार करते हैं। 

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    आज भी यहां के लोग गोरी नदी समेत उसकी सहायक नदियों को पार करने के लिए कच्चे झूलापुल और जानलेवा गरारियों का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले गांव बलमरा, संगलतड़, गराली, तोली, हुड़की, तल्ला ,मल्ला मनकोट, धामीगांव, छोरीबगड़, सेरा, सिरतोला, गोरीपार के बारह गांव और उच्च हिमालयी गांव हैं। 

    सरकारों को आइना दिखाते गांव

    भले ही आज चांद पर पहुंचने के दावे किए जाते हैं, सरकारे गांव-गांव तक विकास की गंगा बहाने की बात करती है। वहीं, पिथौरागढ़ में गोरी नदी घाटी पर बसे ये गांव सरकारों के तमाम दावों और वादों को आइना दिखाने का काम कर रहे हैं। 

    यह गांव आज बेबसी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। एक कड़वी सच्चार्इ ये भी है कि यह डोलने वाले झूला पुल और जानलेवा गरारियां दर्जनों गांवों की लाइफ लाइन हैं। बावजूद इसके इनकी मरम्मत तक नहीं हो पार्इ है। क्षेत्र के इन गांवों के लिए पक्के पुल और सड़कों के बनने की उम्मीद अभी भी एक सपना है। 

    थर्राता जनजीवन

    विश्व प्रसिद्ध मिलम ग्लेशियर से निकलने वाली विशाल गोरी नदी और उसकी सहायक नदियां तिब्बत सीमा से लगे क्षेत्र में जनजीवन को थर्राती हैं। ग्रीष्मकाल में जब बर्फ पिघलने लगती है तो सभी नदियों का जल स्तर बढ़ जाता है। मानसून में तो यह नदियां विकराल रूप धारण कर लेती हैं। जो मिलम से लेकर जौलजीवी में लगभग 132 किमी तक गोरी नदी के किनारे बसी घनी आबादी को डराने का काम करती है। 

    नदी के पूर्वी छोर की तरफ जहां बाजार, विद्यालय समेत अन्य उपक्रम हैं तो पश्चिमी छोर पर बड़े-बड़े गांव हैं। कुछ गांवों की तो स्थिति यह है कि खेत भी नदी के दूसरी तरफ है। इसके चलते ग्रामीणों को रोज नदी के दूसरी तरफ जाना पड़ता है। जिससे कभी भी किसी भी वक्त उनके साथ कोर्इ बड़ा हादसा हो सकता है।

    पुलों की आस में रुका विकास

    हैरान करने वाली बात है कि जौलजीवी से लेकर मिलम तक 132 किलोमीटर की दूरी पर सिर्फ तीन मोटर पुल हैं जो  जौलजीवी, कौली और मदकोट में हैं। जौलजीवी से कौली की दूरी 15 किलोमीटर है जबकि कौली से मदकोट की दूरी 30 किलोमीटर है। 

    इसके अलावा गर्जिया में सौ साल पुराना झूला पुल के साथ ही चामी और बंगापानी में भी झूला पुल हैं। जो बदहाली के आंसू बहा रहे हैं। साथ ही हुड़की, आलम, फगुवा और बसंतकोट के पास गरारी हैं, वो भी क्षतिग्रस्त हैं। 

    इन गरारियों से आर-पार जाने में हर साल कई लोगों की जानें चली जाती हैं। इतना ही नहीं उच्च हिमालय में भी गोरी नदी पर कच्चे पुल हैं, जो हर साल शीतकाल में हिमपात से तो मानसून में नदी के प्रवाह से बह जाते हैं।

    मानसून के आते ही चार माह में गोरी नदी घाटी के दर्जनों गांवों का शेष जगत से संपर्क टूट जाता है, स्कूली बच्चों का विद्यालय जाना बंद हो जाता है। आज इन गांवों के लिए बनी लाइफ लाइन खुद बीमारी से जूझ रही है। 

    इस घाटी में रहने वाले लोग सरकार से आस लगाए बैठे हैं। उन्हें उम्मीद है कि आज नहीं तो कल उनकी समस्याओं का समाधान होगा। इसी उम्मीद में वो अपनी पहाड़ सी जिंदगी को भी बड़ी आसानी से जीते चले आ रहे हैं। कठिनाइयां हो या हादसे उनकी उम्मीदों को नहीं डिगा पा रहे हैं। उन्हें उम्मीद है सरकारों से कि उनकी मुश्किलों का अंत होगा और एक नर्इ सुबह की शुरुआत होगी।

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