नैनीताल, [जेएनएन]: दुष्कर्म के बाद महिला की हत्या के मामले में दो दोषियों को निचली अदालत से दी गई फांसी की सजा को हाईकोर्ट ने सही ठहराया है। लेकिन, अभियुक्तों को जेल में अकेले में रखने को असंवैधानिक करार दिया है। अदालत ने इनके खिलाफ दर्ज मुकदमे में एससी-एसटी एक्ट की धारा लगाने को भी गलत माना। 

मामले की सुनवाई वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ ने की। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि अभियुक्तों के भी संवैधानिक अधिकार हैं और उन्हें सजा सुनाए जाने के बाद दो तीन दिन तक ही जेल में अकेला रखा जा सकता है।

उसके बाद उन्हें अन्य कैदियों के साथ रखा जाए। कोर्ट ने जेल मैनुअल के इससे संबंधित प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया। कहा कि फांसी की सजा पाए अभियुक्तों को 24 घंटे में से 23 घंटे अलग रखना गलत है। कोर्ट ने टिप्पणी की है कि यह भी एक प्रकार से दूसरी सजा है। 

यह था मामला

विकासनगर निवासी एक व्यक्ति ने सहसपुर थाने में घटना की प्राथमिकी दर्ज कराई थी। जिसमें बताया गया कि 29 दिसंबर 2012 को उसकी 55 वर्षीय मां गाय चराने के लिए जंगल गई थी, मगर घर नहीं लौटी। खोजबीन के दौरान महिला का शव बरामद हुआ। महिला की दुष्कर्म के बाद हत्या की गई थी। पुलिस ने इस मामले में सुशील और महताब को गिरफ्तार किया था। 

निचली अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा 

27 जनवरी 2014 को एडीजे प्रथम देहरादून ने दोनों को दुष्कर्म व हत्या का दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई। साथ ही एससी-एसटी एक्ट की धारा भी जोड़ दी। अभियुक्तों ने इस फैसले के खिलाफ खिलाफ नैनीताल हाईकोर्ट में विशेष अपील दायर की थी।

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Posted By: Raksha Panthari

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