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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 11, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

कुमाऊं में सरकारी अस्‍पतालों में न्यूरोसर्जन नहीं होने से पहले आंखों की रोशनी गई और अब जान

By Skand ShuklaEdited By:
Published: Tue, 11 Jun 2019 10:36 AM (IST)

गरीब मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं लेकिन सरकार है कि न तो चिकित्सा व्यवस्था की बदहाली ...और पढ़ें

कुमाऊं में सरकारी अस्‍पतालों में न्यूरोसर्जन नहीं होने से पहले आंखों की रोशनी गई और अब जान
कुमाऊं में सरकारी अस्‍पतालों में न्यूरोसर्जन नहीं होने से पहले आंखों की रोशनी गई और अब जान

हल्द्वानी, जेएनएन : गरीब मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं, लेकिन सरकार है कि न तो चिकित्सा व्यवस्था की बदहाली सुधार पा रही है और न ही सुपर स्पेशलिस्ट तैनात किए जा रहे हैं। पिथौरागढ़ से इलाज के लिए एसटीएच लाया गया एक साल का बच्चा कुछ दिन पहले न्यूरोसर्जन के अभाव में वापस भेज दिया गया था। बच्चे को उपचार नहीं मिल पाया। गंभीर बीमारी से पहले उसकी आंखों की रोशनी चली गई और सोमवार को वह जिंदगी की जंग हार गया। 

चार दिन भर्ती रहा था एसटीएच

धारचूला के हाट गांव निवासी रुकम सिंह बोरा ने अपनेएक वर्षीय बेटे आर्यन को सिर में तकलीफ होने पर पहले धारचूला और फिर जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ के अस्पतालों में दिखाया। कहीं कोई इलाज नहीं मिला तो उम्मीद के सहारे बच्चे को हायर सेंटर यानी राजकीय मेडिकल कॉलेज के डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय लेकर आए। बीती एक जून को भर्ती कराया। चार दिन तक बच्चा भर्ती रहा, लेकिन न्यूरोसर्जन नहीं होने की वजह से उसे रेफर कर दिया गया। गरीब रुकम के पास घर जाने तक के पैसे नहीं थे। इसलिए उसने दूसरे अस्पताल में बच्चे को नहीं दिखाया। डॉक्टरों ने बच्चे के दिमाग में पानी भरने की बात कही थी। सामाजिक कार्यकर्ता गुरविंदर चड्ढा ने निजी अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था की, लेकिन रुकम अपनी आर्थिक तंगी से परेशान होकर घर लौट गए। घर पहुंचते ही बच्चे की आंखों की रोशनी चली गई थी और सोमवार को लाडला चल बसा। 

ऐसे में कौन न्यूरोसर्जन टिकेगा

एसटीएच में न्यूरोसर्जरी का अलग विभाग नहीं है। डेढ़ साल पहले तक दो न्यूरोसर्जन तैनात थे, मगर विभागीय अव्यवस्था और सरकारी अनदेखी के चलते दोनों ने एसटीएच छोड़ दिया। जबकि, कमिश्नर राजीव रौतेला से लेकर तमाम अधिकारियों ने अस्पताल का दौरा किया, व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए लेकिन हकीकत वैसी की वैसी रही।

निदेशक अभी तक निरीक्षण को नहीं पहुंचे

चिकित्सा शिक्षा निदेशक युगल किशोर पंत को कार्यभार ग्रहण किए हुए चार महीने से अधिक समय हो गया है। उन्होंने राज्य के पहले और कुमाऊं के एकमात्र मेडिकल कॉलेज के निरीक्षण करने की सुध तक नहीं ली है।

न्यूरोसर्जन के पद सृजित हुए 

प्रो. सीपी भैंसोड़ा, प्राचार्य, राजकीय मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी ने बताया कि न्यूरोसर्जन के पद सृजित हो चुके हैं। इनकी नियुक्ति की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है। सुपरस्पेशलिस्ट सरकारी अस्पतालों में ज्वाइन करना नहीं चाहते हैं। फिर भी हमारी कोशिश है कि मरीजों को लाभ मिले। इसके लिए पूरे प्रयास किए जा रहे हैं।

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