हल्द्वानी, जेएनएन : बहुप्रतिक्षित जमरानी बांध की डीपीआर पर दिल्ली के केंद्रीय जल आयोग में मंथन चल रहा है। केंद्रीय जल आयोग व उत्तराखंड सिंचाई विभाग के अफसर डीपीआर की जांच कर कमियां दूर करने में जुटे हैं। जल्द ही दोनों महकमों के आला अफसरों के बीच डीपीआर पर अंतिम निर्णय होने के साथ ही बांध निर्माण को हरी झंडी मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
पिछले कई दिनों से केंद्रीय जल आयोग व उत्तराखंड सिंचाई विभाग के अफसर दिल्ली में डेरा डालकर डीपीआर की कमियां दूर करने में जुटे हैं। गुरुवार को जमरानी बांध परियोजना के अधिशासी अभियंता जावेद अनवर भी दिल्ली रवाना हो चुके हैं। सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता मोहन चंद्र पांडे ने बताया कि डीपीआर की सभी कमियां दूर होने पर दोनों महकमों के आला अफसरों के बीच अंतिम दौर की वार्ता के साथ ही डीपीआर को हरी झंडी मिलने की उम्मीद है। इसके बाद डीपीआर को वित्तीय स्वीकृति के लिए केंद्रीय वित्त आयोग को भेजा जाएगा।

1975 में शुरू हुई थी कवायद
गौला नदी में जमरानी बांध बनाने की कवायद 1975 में शुरू हुई थी। उस समय बांध के साथ ही गौला बैराज बनाने की कुल लागत 61.25 करोड़ रुपये रखी गई। पिछले 44 सालों से सारी कवायदें बैठकों तक ही सीमित रह गई। जनांदोलन होने के बाद भी जब बांध निर्माण का प्रस्ताव अटका रहा तो लोग मायूस होने लगे। इसे लेकर उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के बीच पानी बंटवारे का पेच भी सालों तक फंसा रहा। हालांकि लिखित एमओयू मिलने पर बांध निर्माण की पहली बाधा खत्म हो गई। इसके बाद वनभूमि की वजह से परियोजना पर संशय बरकरार रहा। वहीं पिछले कुछ सालों में जमरानी बांध की फाइल फिर तेजी से दौड़ने लगी। डिजाइन को स्वीकृति मिलने के साथ ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भी निर्माण के लिए सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी है। इंटरनेशनल समझौता होने के साथ ही सेंट्रल इलेक्ट्रिकल अथॉरिटी से भी बांध निर्माण को स्वीकृति मिल गई है।

43 फीसद उत्तराखंड और 57 फीसद उत्तरप्रदेश को मिलेगा
पानी उत्तराखंड राज्य के उत्तर प्रदेश के अलग होने के बाद दोनों प्रदेशों के बीच जमरानी बांध के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद हो गया था। कई साल विवाद चलने के बाद दोनों प्रदेशों के बीच समझौता हो गया। इस समझौते के मुताबिक बांध का 43 फीसद पानी का उपयोग उत्तराखंड करेगा, जबकि 57 फीसद पानी उत्तरप्रदेश को देना होगा।

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