चंद्रशेखर बड़सीला, गरुड़ : मैं कभी कल-कल की मधुर ध्वनि के साथ निरंतर बहती रहती थी और पानी से लबालब होकर न केवल हजारों लोगों की प्यास बुझाती थी बल्कि हजारों हेक्टेयर भूमि में फसलों की सिंचाई भी करती थी। आज मैं अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही हूं। कोई मुझे बचाए... बीस साल पहले अपने खेत की मेड़ पर काम करते हुए भूपाल सिंह ने अपने वजूद को बचाने के लिए कराह रही बुरसौल नदी की इस पीड़ा को सुना तो उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने देखा कि जो नदी कभी सदानीरा रहती थी, आज वह रोखड़ में तब्दील हो रही है और उसमें कंकड़-पत्थर दिखाई दे रहे हैं। फिर क्या था। उन्होंने ऐसा भगीरथ प्रयास किया कि आज बुरसौल नदी उन्हीं की बदौलत सिंदा है।

तहसील के मुझारचौरा निवासी भूपाल सिंह कठायत ऐसे व्यक्ति हैं, जो पिछले बीस साल से बुरसौल नदी को बचाने में जुटे हैं। बीस वर्ष पूर्व  बुरसौल नदी एकदम सूखने के कगार पर पहुच गई थी। नदी का जल स्तर इतना घट गया था कि प्यास बुझाना और सिंचाई करना तो दूर रहा, जलीय जंतु भी बिना पानी के तड़पने लगे।ऐसे में भूपाल सिंह ने इस जीवनदायिनी नदी को बचाने का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने नदी के स्रोत से ऊपर दीपामाई मंदिर, जाड़ापानी और मुझारचौरा में चौड़ी पत्ती के पौधों का रोपण किया। समय बीता और देखते ही देखते बुरसौल नदी ने अविरल जलधारा बहने लगी।

बिना किसी सरकारी इमदाद के भूपाल ङ्क्षसह प्रतिवर्ष बुरसौल नदी के मुहाने से ऊपर  सौ मीटर की दूरी पर चौड़ी पत्ती के पौधों का रोपण करते आ रहे हैं। इतना ही नहीं वे खेती-किसानी करने के बाद अपना अधिकांश समय नदी किनारे लगाए गए पेड़-पौधों की देखभाल करने में बिताते हैं। उन्होंने नदी में पानी को मापने का यंत्र भी लगाया है। यदि कहा जाय कि बुरसौल नदी आज भूपाल के भगीरथ प्रयासों से ही जीवित है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

बहुजातीय प्रजाति जंगल भी विकसित

भूपाल सिंह ने चौड़ी पत्ती समेत बहुजातीय प्रजाति का एक जंगल भी विकसित किया है। भूपाल सिंह ने बताया कि दीपामाई, जाड़ापानी और मुझारचौरा का गधेरा स्थानीय भैरव मंदिर में मिलते हैं। यहीं से बुरसौल नदी का उदगम होता है। उन्होंने बताया कि उन्होंने इस उदगम स्थल से ऊपर दो सौ मीटर की दूरी पर तिमुल, कुरैणी, बांज, फलयांट समेत बहुजातीय प्रजाति का जंगल विकसित किया है। जिससे बुरसौल नदी अब सदानीरा बनी हुई है। उन्होंने बताया कि कुरैणी जलीय पौधा है। इससे काफी पानी मिलता है।इसे बहुतायत में लगाया जाना चाहिए।

भावनात्‍मक रूप से जुड़ना होगा नदी नालों से

भूपाल सिंह कठायत ने बताया कि आज लोग नदी-नालों और जलस्रोतों में सीवर बहा रहे हैं। पॉलिथीन और गंदगी से उन्हें पाट रहे हैं। पर्यावरण दिवस पर रैली निकालना, गोष्ठियां करना महज एक औपचारिकता है। लोग जब तक नदी-नालों और जलस्रोतों की पूजा नहीं करेंगे, भावना के साथ उनका संरक्षण नहीं करेंगे। तब तक बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना ही पड़ेगा।

यह भी पढ़ें : जमरानी बांध की डीपीआर पर दिल्ली में मंथन, 48 साल से चल रही प्रक्रिया

यह भी पढ़ें : बद्री गाय के दूध और घी से चमकेगी किसानों की तकदीर, जानें क्‍या है योजना

 

Posted By: Skand Shukla