खत्म हुआ 19 साल का इंतजार, अस्तित्व में आई उत्तराखंड की जल नीति
उत्तराखंड की जल नीति अस्तित्व में आ गई है। राजभवन से स्वीकृति के बाद शासन ने जल नीति की अधिसूचना जारी कर दी है।
देहरादून, राज्य ब्यूरो। 19 साल के इंतजार के बाद उत्तराखंड की जल नीति अस्तित्व में आ गई है। राजभवन से स्वीकृति के बाद शासन ने जल नीति की अधिसूचना जारी कर दी है। पारिस्थितिकी और विकास अभिज्ञता पर आधारित नीति में जल संरक्षण को पारंपरिक तौर-तरीकों को शामिल करने के साथ ही जलस्रोतों के पुनर्जीवीकरण पर खास फोकस किया गया है।
भूजल के निरंतर गिरते स्तर को थामने के लिए उपभोग सीमा तय करने पर जोर दिया गया है तो कृषि के लिए सूक्ष्म सिंचाई पर। सूखते जलस्रोतों ने सभी को बेचैन किया हुआ है। नीति आयोग की रिपोर्ट ही बताती है कि राज्य में करीब तीन सौ जलस्रोत और छोटी नदियां सूख चुकी हैं। भूजल का भी अनियंत्रित दोहन हो रहा है। ऐसे में राज्य में दिक्कतें नजर आने लगी हैं। इस सबको देखते हुए लंबे इंतजार के बाद अब राज्य की जलनीति बनी है।
पूर्व में कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी थी। नीति में जल संसाधनों के नियोजन, विकास और प्रबंधन को ढांचा प्रदान करने पर जोर दिया गया है। साथ ही सुरक्षित एवं शुद्ध पेयजल, स्वच्छता, मलजल सफाई व पशुधन की जरूरतें, सिंचाई, जलविद्युत परियेानजाएं, पारिस्थितिकी, वनीकरण, जैव विविधता, पारिस्थितिकीय पर्यटन, कृषि आधारित उद्योगों व अन्य उपयोग के लिए जल की उपलब्धता को नीति के केंद्र में रखा गया है। सचिव सिंचाई डॉ.भूपिंदर कौर औलख के अनुसार राज्यपाल की स्वीकृति के बाद जलनीति अधिसूचित कर दी गई है।
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जल नीति के मुख्य बिंदु
-जलस्रोत पुनजीर्वीकरण को पहल
-ग्रेविटी आधारित योजनाओं को बढ़ावा
-मीटर आधारित चौबीसों घंटे पानी
-भूजल का नियंत्रित दोहन
-अवैध रूप पंपिंग पर कार्रवाई
-नहरों का आधुनिकीकरण
-जल भंडारण को उपाय
-कृषि को ड्रिप सिंचाई
-उद्योगों से दूषित जल का शोधन
-संवेदनशील स्थलों का चिहनीकरण
-पेयजल की गुणवत्ता पर फोकस
-वर्षा जल संरक्षण को उपाय
-पानी के उपयोग का लेखा-जोखा
यूडब्ल्यूआरएमआरसी का गठन नीति के अनुसार
उत्तराखंड जल संसाधन प्रबंधन और नियामक आयोग (यूडब्ल्यूआरएमआरसी) का राज्य में गठन होगा। तब तक पानी के उपयोग व भुगतान के संबंध में उप्र जलसंभरण और सीवर व्यवस्था अधिनियम के प्रविधानों के तहत प्रभार लगाने और वसूली का कार्य उत्तराखंड जल संस्थान करेगा।
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