देहरादून, राज्य ब्यूरो। वन्यजीव संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभा रहे उत्तराखंड में बाघों के बाद अब राष्ट्रीय विरासत पशु हाथी के कुनबे में इजाफा होने के साथ ही चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। जिस हिसाब हाथियों की संख्या बढ़ी है, उसे देखते हुए वासस्थल विकास पर ध्यान केंद्रित करने की चुनौती है।

वैसे भी राज्य में यमुना नदी से लेकर शारदा नदी तक के क्षेत्र में हाथियों का बसेरा है और इसमें भी उन्हें आवाजाही में तमाम गतिरोधों से दो-चार होना पड़ रहा है। हालांकि, इनकी आवाजाही के लिहाज से 11 परंपरागत गलियारे चिह्नित हैं, मगर कहीं मानव बस्तियां उग आने तो कहीं सड़क और रेल मार्गों के कारण ये बाधित हैं। ऐसे में हाथियों की स्वच्छंद आवाजाही पर असर पड़ा है। परिणामस्वरूप हाथी और मनुष्य के बीच भिड़ंत भी निरंतर हो रही है। इन चुनौतियों से पार पाने के लिए वन महकमे को कमर कसनी होगी। इस लिहाज से अब मंथन भी शुरू हो गया है।

282 टस्कर और 22 मखना

राज्य में हाल में हुई हाथी गणना के आंकड़ों को देखें तो यहां 304 नर हाथी हैं। इनमें 282 टस्कर (बाहरी दांत वाले) और 22 मखना (जिनके बाहरी दांत नहीं होते) हैं। मादा हाथियों की संख्या 771 है। इसके अलावा पांच से 15 साल के 447, एक से पांच साल के 285 और एक साल से कम के 172 हाथी हैं। 47 हाथियों के लिंग की पहचान नहीं हो पाई।

ये हैं चुनौतियां

-हाथियों की बढ़ी संख्या के हिसाब से उनके लिए वासस्थल का विकास। 

-स्वच्छंद आवाजाही के लिए गलियारों को निर्बाध करना। 

-जंगलों से गुजर रही सड़कों और रेल मार्गों पर इनके आवागमन को रास्ते छोड़ना। 

-जंगलों पर तेजी से बढ़ रहे जैविक और विकासात्मक दबाव को कम करना। 

राज्य में हाथी गलियारे

कासरो-बड़कोट

चीला-मोतीचूर

मोतीचूर-गौहरी

रवासन-सोनानदी (लैंसडौन)

रवासन-सोनानदी (बिजनौर)

दक्षिण पतली दून-चिलकिया

चिलकिया-कोटा

कोटा-मैलानी

फतेहपुर-गदगदिया

गौला रौखड़-गौराई-टाडा

किलपुरा-खटीमा-सुरई

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वन और पर्यावरण मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने बताया कि निश्चित रूप से हाथियों की संख्या बढऩे के साथ ही वन महकमे की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। इसी के मद्देनजर यमुना से लेकर शारदा तक के क्षेत्र के जंगलों में हाथियों की धारण क्षमता का अध्ययन कराया जा रहा है। वासस्थल विकास के अलावा गलियारे निर्बाध करने की दिशा में भी नई रणनीति के साथ कदम बढ़ाए जाएंगे। 

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