देहरादून, जेएनएन। नगर निगम के शीशमबाड़ा स्थित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। प्लांट से उठ रही दुर्गंध और इससे संक्रमण के खतरे को देखते हुए उत्तराखंड बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस भेजा है। बोर्ड की ओर से वहां दुर्गंध रोकने के लिए क्या प्रयास किए गए, इस पर एक माह में जवाब मांगा गया है।

शीशमबाड़ा के ग्रामीणों की ओर से प्लांट का लगातार विरोध किया जा रहा। प्लांट से उठ रही दुर्गंध से आसपास का जन-जीवन प्रभावित हुआ है। आरोप है कि नजदीक के सभी शिक्षण संस्थानों में बच्चे मॉस्क लगा पढ़ाई कर रहे हैं। बच्चों को कक्षा के अंदर सांस लेने में भी परेशानी हो रही। आरोप है कि दुर्गंध की वजह से कई बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। बीते दिनों इसी विरोध में प्लांट के बाहर आगजनी हुई थी। हिंसक प्रदर्शन के दौरान कार में आग लगा दी गई। जिसे देखते हुए जिलाधिकारी को प्लांट की 200 मीटर की परिधि में धारा-144 लगानी पड़ी। इसके बावजूद ग्रामीणों ने विरोध बंद नहीं किया है। उनकी शिकायत पर बुधवार को बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने संज्ञान लिया। आयोग ने कहा कि बच्चों को प्लांट की वजह से उठ रही दुर्गंध के चलते कैद में रहना पड़ रहा है। उद्योगों से सेस के रूप में मिलने वाली धनराशि का प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्या उपयोग कर रहा, ताकि बच्चों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराया जाए। एक माह में इस पर जवाब मांगा गया है।

एनओसी बिना चल रहा प्लांट

शीशमबाड़ा में दो साल पहले शुरू हुआ सूबे का पहला सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट एंड रिसाइक्लिंग प्लांट पिछले पांच माह से बिना एनओसी चल रहा है। प्लांट के संचालन के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से हर वर्ष कंसर्न टू ऑपरेट एनओसी जरूरी होती है, लेकिन इस बार बोर्ड ने प्लांट को एनओसी नहीं दी है। प्लांट को दी एनओसी अगस्त-2019 में खत्म हो चुकी है। इसके बाद प्लांट अवैध रूप से संचालित हो रहा। एनओसी न देने के पीछे प्लांट में चल रही गड़बडिय़ां वजह बताईं जा रहीं हैं। यही वजह है कि ग्रामीण इस प्लांट को बंद करने की मांग कर रहे।

कूड़ा निस्तारण में भी फेल है प्लांट

जनवरी-2017 में शुरू हुआ प्रदेश के पहले सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट का दो साल बाद भी विवादों से नाता नहीं छूट रहा है। जन-विरोध के चलते यह प्लांट सरकार के लिए पहले ही मुसीबत बना है और अब प्लांट प्रबंधन की लापरवाही सरकार के सिर का दर्द बनती जा रही। दावे किए जा रहे थे कि यह पहला वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट है, जो पूरी कवर्ड है और इससे किसी भी तरह की दुर्गंध बाहर नहीं आएगी, मगर नगर निगम के यह दावे तो शुरुआत में ही हवा हो गया था। उद्घाटन के महज दो साल के भीतर अब यह प्लांट कूड़ा निस्तारण में भी 'फेल' हो चुका है।

इलेक्ट्रॉनिक कचरे पर जागा पीसीबी, बनाई कमेटी

देहरादून समेत अन्य मैदानी शहरों में ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) न सिर्फ बड़ी मात्रा में निकल रहा है, बल्कि उसका उचित तरीके से निस्तारण भी नहीं हो पा रहा। हालांकि, पहली बार नींद से जागते हुए उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ई-वेस्ट के नियमों के अनुरूप निस्तारण करने के लिए नौ सदस्यीय कमेटी का गठन किया है।

बुधवार को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) के सदस्य सचिव एसपी सुबुद्धि की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में कमेटी का गठन किया गया। बोर्ड के पर्यावरण अभियंता सोमपाल सिंह को कमेटी (समिति) का अध्यक्ष बनाया गया है। इस समिति में ई-वेस्ट पर काम करने वाली कंपनियों और सामाजिक संगठनों को भी शामिल किया गया है। फिलहाल, यह समिति राज्य के पांच बड़े शहरों, देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, हल्द्वानी और काशीपुर में ई-वेस्ट पर काम करेगी। समिति मुख्य रूप से इन शहरों में ई-वेस्ट की स्थिति और वर्तमान में वहां ई-वेस्ट के निस्तारण के तौर-तरीकों का अध्ययन करेगी। इसके साथ ही इन शहरों में ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर भी स्थापित किए जाएंगे। दूसरी तरफ जन जागरण कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को भी जागरुक किया जाएगा।

बैठक में समिति के अध्यक्ष सोमपाल सिंह ने बताया कि राज्य के शहरी क्षेत्रों में ई-वेस्ट की समस्या को देखते हुए जल्द ही कमेटी की बैठक बुलाकर कार्य शुरू कर दिया जाएगा। उम्मीद जताई गई कि कमेटी अपने उद्देश्यों को पूरा करने में सफल होगी और इससे राज्य में बढ़ी रही ई-वेस्ट की समस्या से निजात मिल पाएगी।

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वर्तमान में नहीं व्यवस्था

कमेटी में शामिल सोशल डेवलपमेंट फॉर डेवलपमेंट कम्युनिटीज फाउंडेशन के अध्यक्ष अनूप नौटियाल ने बताया कि फिलहाल राज्य में ई-वेस्ट के निस्तारण को लेकर कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। हालांकि, केंद्र सरकार ने ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल-2016 बनाया है। इस नियम की आमजन को जानकारी होना तो दूर इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का काम करने वाले प्रष्ठिानों तक को इस बारे में पता नहीं है। यह बात और है कि नियमों में इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों के विक्रेताओं की ओर से पुराने और खराब उपकरण वापस लेने की व्यवस्था भी शामिल है। अधिकतर लोग आम कूड़े के साथ ही खराब इलेक्ट्रॅनिक्स उपकरणों का निस्तारण कर रहे हैं। पर्यावरण के लिए यह बेहद खतरनाक स्थिति है।

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Posted By: Sunil Negi

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