ऋषिकेश, जेएनएन। तीर्थनगरी ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट को त्रिवेणी इसलिए कहा जाता है कि यहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। लेकिन प्रचार के अभाव में आमजन और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान महज एक गंगा घाट बन कर रह गया है।  

त्रिवेणी घाट पर हर दिन गंगा आरती होती है। दशहरे के मेले में यहां हजारों लोग अधर्म पर धर्म की जीत के प्रतीक रावण मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन देखने आते हैं। बसंत पंचमी के मौके पर भगवान भरत जी महाराज की डोली को यहां लाकर स्नान कराया जाता है। पूरे वर्ष यहां बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। साथ ही पर्वतीय क्षेत्र से देव डोलियां भी स्नान के लिए यहां लाई जाती है।

कुंभ और महाकुंभ में यहां नगर और आसपास क्षेत्र के अतिरिक्त गढ़वाल मंडल से हजारों की तादाद में श्रद्धालु डुबकी लगाने आते हैं। प्रमुख स्नान पर्व पर भी यहां डुबकी लगाना विशेष पुण्य कारी माना गया है। शिक्षाविद् वंशीधर पोखरियाल के अनुसार त्रिवेणी घाट में पावन नदी गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। इसीलिए इस स्थान का नाम त्रिवेणी पड़ा था। पर्वतीय हिमालय क्षेत्र से गंगा ऋषिकेश में आकर मैदान की ओर बढ़ती है। इसी के तट पर यमुना जी का कुंड है, जिसे ऋषि कुंड जिसे सूर्यकुंड भी कहा जाता है। जिसे अब लोग सरस्वती नाला कहते हैं, वहां प्रत्यक्ष रूप में सरस्वती की धारा विराजमान है। 

गंगा के इसी तट पर रैम्य ऋषि ने तप किया था। शास्त्रों के मुताबिक भगवान नारायण ने यहां कुब्जा मर्क यानी आम की झुकी हुई डाली के रूप में ऋषि को दर्शन दिए थे। इस शहर का पुरातन नाम कुब्जामर्क भी है। हृषिकेश नारायण यानी भगवान भरत की यह भूमि है इसीलिए इसका नाम हृषिकेश और बाद में ऋषिकेश पड़ा। 

इतने पौराणिक महत्व वाला ये स्थल पर्यटन मानचित्र पर सिर्फ एक घाट के रूप में दर्ज है। पर्यटन विभाग के तमाम साहित्य और दस्तावेज में कहीं भी तीनों नदियों के महत्व के बारे में विस्तार से जिक्र नहीं मिलता है। 

यमुना कुंड में सूर्य देव ने दिए थे दर्शन 

त्रिवेणी घाट के समीप स्थित ऋषि कुंड यानी सूर्य कुंड की उत्पत्ति भी एक ऋषि के तप का परिणाम मानी जाती है। शास्त्रों और मान्यताओं के अनुसार गालिव नाम के ऋषि ने यहां भगवान सूर्य देव की उपासना व तप किया था। भगवान सूर्य यहां पर प्रकट हुए और उन्होंने यहां यमुना जी को सदा के लिए प्रकट किया। यमुना जी का स्रोत यहां स्थित है। इस कुंड का पानी हमेशा एक रंग व शीतलता से युक्त रहता है। किसी भी मौसम में इसका पानी कभी मटमैला नहीं होता। आसपास कभी भी जब भवनों का निर्माण होता है तो कुछ मीटर नीचे से ही यमुना का स्रोत फूट पड़ता है। 

त्रिवेणी के उद्धार का 23 वर्ष पूर्व हुआ था प्रयास 

वर्ष 1996 यानी 23 वर्ष पूर्व हुए कुंभ में तत्कालीन कुंभ मेला प्रशासन ने त्रिवेणी घाट के त्रिवेणी नाम को साक्षात दिखाने के लिए प्रयास किया था। तत्कालीन कुंभ मेलाधिकारी पीके मोहंती ने यहां पार्किंग के समीप कुंभ मेला बजट से यमुना जी की मूर्ति लगवाई थी और यहीं पर एक सुंदर कुंड का निर्माण कराया था। इसके अतिरिक्त सरस्वती, जमुना और गंगा की धाराओं को टेप करने के बाद एक स्थान पर श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ संयुक्त धारा निकलवाई थी। उस वक्त यदि स्थानीय प्रशासन और पर्यटन विभाग मेला प्रशासन के इस प्रयास को संरक्षित करते हुए इसकी महत्व के अनुरूप ब्रांडिंग करता तो आज त्रिवेणी का स्वरूप और अधिक निखरा हुआ होता। बाद में यमुना जी की मूर्ति और स्थल अतिक्रमण का शिकार हो गया। संयुक्त संगम की धारा मलबे में दब गई। 

महापौर अनीता ममगाईं का कहना है कि त्रिवेणी और त्रिवेणी घाट तीर्थ नगरी की पहचान और हृदय स्थली है। यहां श्रद्धालुओं के लिए इसी लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती है। त्रिवेणी को उसके नाम के अनुरूप विकसित करने और इसका प्रचार-प्रसार इसके महत्व के अनुरूप करना वाकई जरूरी है। इस दिशा में सार्थक पहल होगी। 

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Posted By: Raksha Panthari

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