उत्‍तरकाशी, शैलेंद्र गोदियाल। इस बार हुई भारी बर्फबारी के कारण गंगोत्री-गोमुख-तपोवन के बीच 24 किमी लंबे रास्ते का पता नहीं चल पा रहा। गंगोत्री से गोमुख के बीच 50 हिमखंड ऐसे बने हैं, जिन्हें पार करना किसी चुनौती से कम नहीं। स्थिति इतनी विकट है कि 24 किमी का जो सफर आठ से दस घंटे में तय हो जाता था, उसमें अब 33 घंटे लग रहे हैं। वह भी उस संन्यासी को, जो पिछले 12 वर्षों गोमुख से पांच किमी आगे 4500 मीटर की ऊंचाई पर तपोवन में तप कर रहा है। मौनी बाबा के नाम से प्रसिद्ध इस संन्यासी का नाम है पूर्ण चैतन्य, जो बीते सप्ताह तपोवन से गंगोत्री पहुंचे और गोमुख क्षेत्र की स्थिति को बयां किया। 

संन्यासी पूर्ण चैतन्य कहते हैं कि वे तपोवन में वर्ष 2007 से तप कर रहे हैं। इस अंतराल में दस वर्ष तो उन्होंने यहां मौन साधना की। लेकिन, इस तरह की बर्फबारी उन्होंने पहली बार देखी है। वर्ष 2012 में भी तपोवन में बर्फ की चादर बिछी थी, लेकिन इस बार तो यह चादर 20 फीट से अधिक मोटी है। जबकि, गोमुख क्षेत्र में करीब 15 फीट बर्फ की मोटी बर्फ की चादर का कवच गंगोत्री ग्लेशियर को मिला है। बताते हैं कि बीती फरवरी में उन्हें तपोवन से गंगोत्री आना था, लेकिन इस दौरान लगातार बर्फबारी होती रही। दो मार्च को जब मौसम साफ हुआ तो उन्होंने गंगोत्री आने की तैयारी की।

तीन मार्च की सुबह छह बजे वह तपोवन से गंगोत्री के लिए चले। बर्फ के कारण रास्ते का कुछ भी पता नहीं चल रहा था। बस! किसी तरह बर्फ हटाते हुए आगे बढ़ते रहे और रात 11 बजे तक 17 घंटे में सिर्फ 13 किमी ही चल पाए। भोजवासा के निकट खड़ी ढांग के निकट एक बड़े पत्थर की आड़ में उन्होंने सुबह होने का इंतजार किया। बर्फ के कारण खाने और पानी का इंतजाम भी नहीं हो पाया। चार मार्च को तड़के उन्होंने गंगोत्री की ओर बढऩा शुरू किया और रात 10 बजे तक 16 घंटे में 11 किमी का सफर तय कर गंगोत्री पहुंचे। दो दिन गंगोत्री में रुकने के बाद वे फिर पैदल चलकर हर्षिल तक आए और वहां से वाहन के जरिये उत्तरकाशी पहुंचे हैं। बताया कि बर्फ में चलने से पांव के तले बुरी तरह छिल गए हैं, लेकिन उपचार लेने के बाद राहत है। 

संन्यासी पूर्ण चैतन्य बताते हैं कि बीते वर्ष भी वे मार्च में तपोवन से गंगोत्री आए थे। लेकिन तब गंगोत्री-गोमुख मार्ग पर छूनेभर को भी बर्फ नहीं थी। पूछने पर उन्होंने अपने अतीत के बारे में बताने से इन्कार कर दिया। बस! इतना बोले कि वे तपोवन स्थित अपनी कुटिया में तप करते रहेंगे। साथ ही बालिकाओं की शिक्षा और बीमार लोगों की सेवा में भी पूरा सहयोग करेंगे। कहते हैं, बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए ही वे इस बार तपोवन से उत्तरकाशी आए हैं। लेकिन, इस बीच आचार संहिता लग गई। लिहाजा अब 11 अप्रैल के बाद कार्यक्रम करवाया जाएगा। 

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Posted By: Sunil Negi

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