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    क्या है सीबक थोर्न ? जो चीन व नेपाल सीमा से सटे गांवों में बनेगा आजीविका का प्रमुख साधन

    Updated: Mon, 05 Jan 2026 06:26 PM (IST)

    उत्तराखंड के चीन व नेपाल सीमा से सटे गांवों में सीबक थोर्न आजीविका का प्रमुख साधन बनेगा। ग्राम्य विकास विभाग वन विभाग के साथ मिलकर कार्ययोजना बना रहा ...और पढ़ें

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    सीबक थोर्न के फल।

    केदार दत्त, जागरण देहरादून: चीन और नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड के गांवों में औषधीय गुणों के साथ ही पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण सीबक थोर्न आजीविका का प्रमुख साधन बनने जा रहा है। ग्राम्य विकास विभाग ने इस सुपर फ्रूट को स्थानीय आर्थिकी से जोड़ने का निश्चय किया है।

    इसके लिए वह वन विभाग के साथ मिलकर कार्ययोजना तैयार करने में जुटा है। इसके तहत सीमावर्ती गांवों में सीबक थोर्न की नर्सरी, कृषिकरण, प्रसंस्करण और ग्रामीणों को प्रशिक्षण की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। विभाग का प्रयास यह भी है कि राज्य के स्थानीय उत्पादों के अंब्रेला ब्रांड हाउस आफ हिमालयाज के लिए भी इन गांवों से सीबक थोर्न के कुछ बेहतर उत्पाद तैयार किए जाएं।

    क्या है सीबक थोर्न

    उत्तराखंड के उत्तरकाशी, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग समेत अन्य जिलों के उच्च शिखरीय क्षेत्रों में 3000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है सीबक थोर्न। स्थानीय स्तर पर इसे अमेश, वन चूक, अमलिच, शंखधारा, चूक, चुकू समेत अन्य नामों से जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम हिपोफी सालिसिफोलिया है। यह कांटेदार झाड़ी के रूप में उगता है। इसके फलों से बनने वाले उत्पादों की भारी मांग भी है।

    Orange Sea Buckthorn

    औषधीय गुणों से है भरपूर

    सीबक थोर्न के फल औषधीय गुणों से लबरेज हैं और इसी कारण इसे सुपर फ्रूट भी कहा जाता है। इसके पल्प व बीज के तेल में ओमगा तीन, छह, सात, नौ व 12 पाए जाते हैं। विटामिन, प्रोटीन, एमीनो एसिड भी इसमें प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। विभिन्न बीमारियों के उपचार में सीबक थोर्न का उपयेाग होता है। पर्यावरणीय दृष्टि से भी सीबक थोर्न उपयोगी है। इसकी जड़ें भू-कटाव रोकने में सहायक होती हैं। साथ ही भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण का कार्य भी करती हैं।

    सीमावर्ती गांवों की बदलेगा तस्वीर

    ग्राम्य विकास सचिव धीराज गर्ब्याल के अनुसार सीबक थोर्न के गुणों और बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए इसे सीमावर्ती गांवों की आर्थिकी से जोड़ने का निश्चय किया गया है। वहां यह फल बहुतायत में होता है, लेकिन आर्थिकी संवारने का जरिया नहीं बन पाया है। यद्यपि, वन विभाग ने पिथौरागढ़ की दारमा, व्यास, चौदास घाटियों के 12 गांवों में इसे बढ़ावा देने को कदम बढ़ाए हैं।

    तैयार हो रही कार्ययोजना

    सचिव गर्ब्याल ने बताया कि वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम में शामिल राज्य के 91 गांवों के अलावा अन्य गांवों में सीबक थोर्न को बढ़ावा देने के लिए वन विभाग के साथ मिलकर कार्ययोजना तैयार की जा रही है। इसके तहत सीबक थोर्न की पौध की उपलब्धता, फलों की वैज्ञानिक ढंग से हार्वेस्टिंग, मूल्य संवर्द्धन व विपणन को प्रोत्साहित किया जाएगा।

    सीमावर्ती गांवों में सीबक थोर्न से कुछ बेहतर उत्पाद तैयार करने की योजना है, ताकि इसे हाउस आफ हिमालयाज के माध्यम से देश-विदेश में भेजा जा सके। इससे स्थानीय आर्थिकी भी संवरेगी।

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