हरिद्वार, जेएनएन। समाज में श्राद्ध पक्ष और अधिमास को लेकर फैली भ्रांति कहीं गहरे पैठ चुकी है। संत और आचार्य इसका कारण परंपराओं का अंधानुकरण मानते हैं। वे कहते हैं कि श्राद्ध पक्ष और अधिमास में न तो शुभ या कोई नया कार्य करना निषेध है और न ही कपड़े, ज्वेलरी अथवा संपत्ति की खरीदारी पर कोई पाबंदी है। इस काल में तो पितृ स्वंय मृत्यु लोक में पधारकर आशीर्वाद देते हैं। ऐसे में अशुभ का सवाल ही नहीं उठता है।

इन दिनों श्राद्ध पक्ष चल रहा है, जो 17 सितंबर तक चलेगा और इसके बाद 18 सितंबर से अधिमास आरंभ होगा और 16 अक्टूबर तक रहेगा। ऐसे में जनमानस के बीच फैली इस भ्रांति का संतों ने निराकरण किया। श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर आचार्य अवेधशानंद गिरि कहते हैं कि धर्म शास्त्रों में किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है। वह बताते हैं कि  देवी भागवत महापुराण और गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि श्राद्ध पक्ष में  पितृ प्रसन्न होकर हमें आर्शीवाद देने मृत्युलोक में विराजते हैं, हमसे अन्न व जल ग्रहण करते हैं। वह सवाल उठाते हैं कि फिर इस पक्ष को अशुभ कैसे कहा जा सकता है।

सिद्धपीठ दक्षिण कालीमंदिर के पीठाधीश्वर स्वामी कैलाशानंद ब्रह्मचारी के अनुसार पितृ सत्ता और गुरुसत्ता को देव पूजन से बड़ा माना गया है।जब पितृ का आर्शीवाद साथ है तो कैसा अशुभ और कैसा भय। श्राद्ध पक्ष में पितृ और पूर्वज हमें आर्शीवाद देने मृत्यलोक में विराजते हैं। पितृों के आर्शीवाद की छाया में किया गया कोई कार्य अशुभ हो ही नहीं सकता। गरुड़ पुराण में इसका उल्लेख है, हमारे शास्त्रों में इसका वर्णन है, विधान है।  

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महामंडलेश्वर स्वामी हरिचेताननंद का कहना है कि हिदु धर्म में हर शुभ कार्य में दो सत्ताओं का आह्वान अवश्य किया जाता है। वह है पितृ सत्ता और गुरुसत्ता। इस समय तो पितृ सत्ता स्वयं मृत्यलोक में उपस्थित है तो ऐसे कि अशुभ कैसा। देवी भागवत महापुराण भी यही कहता है। 

अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता बाबा हठयोगी के अनुसार गरुड़ पुराण और भागवत पुराण में स्पष्ट है कि श्राद्ध पक्ष में मृत्यु लोक में पधारे पितृों के आशीर्वाद से बढ़कर कुछ नहीं है। ऐसे में हमारे किसी भी कार्य पर अशुभ की छाया कैसे पड़ सकती है। वहीं, उत्तराखंड चार धाम विकास परिषद के अध्यक्ष आचार्य शिव प्रसाद ममगाईं कहते हैं कि श्राद्ध पक्ष में कोई कार्य निषिद्ध नहीं है। वह कहते हैं कि इसी तरह की भ्रांति अधिमास को लेकर हैं। आचार्य के अनुसार अधिमास का वर्णन बदरीनाथ के श्रीमुख से भी हुआ है। जिसका अर्थ है अधिक फलदायी।

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