देहरादून, [केदार दत्त]: उत्तराखंड में जैव विविधता के लिए खतरे का सबब बने चीड़ को नियंत्रित करना सरकार के लिए चुनौती बना है। भले ही चीड़ के पौधरोपण पर रोक लगी हो, मगर प्राकृतिक रूप से इसका फैलाव लगातार हो रहा है। ऐसे में चिंता और बढ़ गई है। हालांकि, वन पंचायतों, सिविल-सोयम और नाप भूमि में खड़े चीड़ के पेड़ों के कटान में छूट दी गई, लेकिन इसका भी दुरुपयोग होने लगा। इस सबको देखते हुए चीड़ कटान को छूट की प्रक्रिया के लिए नई गाइडलाइन तैयार की जाएगी। साथ ही मानीटरिंग पर खास फोकस करते हुए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि स्वीकृति के अनुरूप ही पेड़ कटें। 

चीड़ के कारण उत्पन्न खतरों को देखते हुए इसे हटाने और इसकी जगह मिश्रित वनों को बढ़ावा देने की बात लंबे समय से उठ रही है। इस कड़ी में पर्यावरण के लिहाज से सबसे खतरनाक पिरुल के व्यावसायिक उपयोग ढूंढे गए, मगर ये प्रयोगात्मक स्तर पर ही हैं। इस सबको देखते हुए सरकार भी चाहती है कि चीड़ को नियंत्रित किया जाए, लेकिन इन प्रयासों को पंख नहीं लग पा रहे। अलबत्ता, चीड़ कटान की प्रक्रिया का सरलीकरण कर छूट का प्रावधान किया गया, लेकिन इसके भी दुरुपयोग के रास्ते निकाल लिए गए। हाल में पौड़ी जिले के कोटद्वार में पांच पेड़ों की स्वीकृति की आड़ में दर्जनभर पेड़ काट दिए गए। ऐसी शिकायतें अन्य स्थानों पर भी आई हैं। 

इसलिए खतरनाक है चीड़ 

प्रदेश में वन विभाग के अधीन 25.86 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र में से 15.25 फीसद पर चीड़ के जंगल हैं। इसके लगातार फैलाव से जैव विविधता के लिए खतरा पैदा हो गया है। वजह ये कि चीड़ के जंगल में अन्य वनस्पतियां नहीं पनप पातीं। साथ ही इसकी पत्तियां (पिरुल) फायर सीजन के दौरान जंगल की आग के फैलाव की बड़ी वजह बनती हैं। राज्य में प्रतिवर्ष लगभग प्रति वर्ष 23.66 लाख टन चीड़ की पत्तिया गिरती हैं। जमीन में इनकी परत जमा होने से बारिश का पानी यूं ही बेकार चला जाता है। यही नहीं, पिरुल के कारण भूमि अम्लीय बनती है सो अलग। 

वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत का कहना है कि प्रदेश में चीड़ को देर-सबेर कम करना है। पंचायती वनों, सिविल सोयम क्षेत्र और नापभूमि में चीड़ कटान की प्रक्रिया का सरलीकरण कर इसमें छूट दी गई थी, मगर इसके दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। ऐसे में इसके लिए नए सिरे से गाइडलाइन तय करने के साथ ही मॉनीटरिंग की पुख्ता व्यवस्था के निर्देश दिए गए हैं।

उत्तराखंड में चीड़ के पेड़ जैव विविधता के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। भले बी इनके पौधरोपण पर रोक हो, लेकिन प्राकृतिक रूप से इसका फैलाव लगातार हो रहा है। 

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