जागरण संवाददाता, कोटद्वार: पर्वतीय क्षेत्रों में शैतानियां करने वालों के समक्ष यदि बिच्छू घास (कंडाली) का जिक्र होता है तो न सिर्फ शैतानियां रूक जाती है, बल्कि चेहरे के हावभाव भी उड़ जाते हैं। हालांकि, बुजुर्ग से कंडाली का जिक्र करें तो उनकी जीभ में कंडाली के साग का स्वाद जाग जाता है। लेकिन, अब यही बिच्छू घास मुंबई-दिल्ली में उत्तराखंड को नई पहचान दे रही है। मुंबई-दिल्ली के बड़े होटलों में बिच्छू घास की चाय पसंद बनी है। यह सब संभव हो पाया चैलूसैण निवासी सुनील दत्त कोठारी की मेहनत की बदौलत, जिन्होंने कंडाली को एक नई पहचान दी।

करीब 22 वर्षों तक मुंबई में आइटीसी ग्रुप में सप्लाई चेन हेड पद पर कार्य करने के बाद सुनील 2016 में घर वापस लौट आए और कंडाली पर कार्य करना शुरू किया। दरअसल, सुनील के दादा-परदादा वैद्य थे व उनके लिखित दस्तावेजों में सुनील को बिच्छू बूटी (कंडाली) के गुणों का पता चला। सुनील को कंडाली में ही भविष्य की राह नजर आई और उन्होंने कंडाली की पत्तियों से चाय तैयार करनी शुरू कर दी। इंडियन इंस्टिट्यूट आफ मैटीरियल मैनेजमेंट (आईआईएमएम) से क्वालिटी मैनेजमेंट का कोर्स करने वाले सुनील ने अपनी बाइस वर्ष की सेवा में आठ वर्ष आईटीसी की ओर से ओमान, मस्कट, दुबई व कीनिया में भी सेवाएं दी। साथ ही वे मुंबई की टी-कॉफी एसोसिएशन से भी जुड़े रहे।

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पुराने संपर्क रंग लाए व एसोसिएशन के सहयोग से सुनील ने कंडाली की पत्तियों से बनी चाय को मुंबई-दिल्ली के बड़े होटलों में भेजना शुरू कर दिया। कोठारी पर्वतीय विकास समिति गठित की गई व समिति में ग्रामीणों को जोड़ने का कार्य शुरू हुआ। वर्तमान में ढाई सौ महिलाएं सीधे समूह से जुड़ी हैं। यह महिलाएं पत्तियों के सौ-सौ ग्राम के पैकेट तैयार करती हैं, जिन्हें समूह 200 से 250 रुपये प्रति सौ ग्राम से हिसाब से खरीदता है। इसके बाद इन पैकेट्स को हॉस्पीटेलिटी पर्चेस मैनेजर्स फोरम (आईपीएमएफ) के सुपुर्द कर दिया जाता है। सुनील बताते हैं कि आईपीएमएफ आठ से नौ सौ रूपये प्रति पैकेट से हिसाब से इसकी बिक्री करता है। सुनील क्षेत्र में अब तक 2200 ग्रामीणों को कंडाली की पत्तियों से चाय तैयार करने का प्रशिक्षण दे चुके हैं। प्रशिक्षण का यह क्रम क्षेत्र में आज भी जारी है।

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Edited By: Sumit Kumar