देहरादून, विकास धूलिया। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भले ही गठबंधन धर्म को निभाने को तैयार हो गई हैं, लेकिन महज दो दशक पहले तक उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहे उत्तराखंड में इसका कोई असर पड़ने की ज्यादा संभावना नहीं है। उत्तराखंड के अलग राज्य के रूप में वजूद में आने के बाद से हुए तीन लोकसभा और चार विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा का प्रदर्शन इसकी तस्दीक करता है। सपा इस दौरान एक लोकसभा सीट ही जीत पाई, जबकि बसपा शुरुआत में विधानसभा चुनावों में ठीकठाक प्रदर्शन के बाद लगातार अपना वोट बैंक गंवाती जा रही है। 

अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौरान इस क्षेत्र में सपा की अच्छी खासी पैठ रही। हालांकि, बसपा तब यहां लगभग अस्तित्वविहीन ही थी। वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में सपा ने वर्तमान उत्तराखंड के भौगोलिक क्षेत्र में आने वाली 22 सीटों पर चुनाव लड़कर तीन पर जीत हासिल की। 

महत्वपूर्ण बात यह कि सपा को यह सफलता तब मिली, जब वर्ष 1994 के राज्य आदोलन के चरम के दौरान सपा की छवि उत्तराखंड में खलनायक सरीखी बन गई थी। नौ नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, उस वक्त उत्तर प्रदेश विधानसभा व विधान परिषद के 30 सदस्यों को लेकर अंतरिम विधानसभा का गठन किया गया था। तब अंतरिम विधानसभा में सपा के तीन सदस्य शामिल थे। 

उत्तराखंड गठन के बाद सपा की किस्मत बिल्कुल पलट गई। पिछले चार विधानसभा चुनावों में पार्टी एक अदद सीट जीतने को तरस गई। विधानसभा चुनावों में सपा को हासिल मतों के प्रतिशत में भी लगातार गिरावट दर्ज की गई। 

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में सपा के हिस्से 4.96 प्रतिशत मत आए, जो अगले विधानसभा चुनाव 2012 में घटकर 1.41 प्रतिशत तक सिमट गए। पिछले, यानी वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में तो सपा को राज्यभर में महज 0.40 प्रतिशत ही मत हासिल हुए। 

अलबत्ता सपा के लिए उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद अब तक एकमात्र चुनावी उपलब्धि रही वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार सीट पर जीत। तब राजेंद्र वाडी यहां से सपा के सांसद चुने गए लेकिन इसके बाद कभी भी सपा का खाता उत्तराखंड में नहीं खुला। 

बसपा जरूर उत्तराखंड बनने के बाद तीसरी सबसे बड़ी सियासी ताकत के रूप में उभरी। भाजपा और कांग्रेस के बाद बसपा के ही सर्वाधिक विधायक चुने गए। वर्ष 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में बसपा के सात विधायक चुने गए और तब उसके हिस्से आए 10.93 प्रतिशत मत। 

वर्ष 2007 के चुनाव में बसपा के विधायकों का आंकड़ा आठ तक जा पहुंचा और मत प्रतिशत पहुंच गया 11.76 तक। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल तीन सीटो पर जीत मिली, जबकि उसका मत प्रतिशत रहा 12.19। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा महज 6.98 प्रतिशत मत ही बटोर पाई, जबकि उसे एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई। 

यहां यह जिक्र करना अहम है कि सपा और बसपा की लोकसभा व विधानसभा चुनावों में जीत केवल दो मैदानी जिलों हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर तक ही सीमित रही, पर्वतीय जिलों में ये दोनों पार्टियां शायद ही किसी सीट पर मुख्य मुकाबले का हिस्सा बन पाई। 

अब अगर भाजपा और कांग्रेस के केवल पिछले दो विधानसभा चुनावों के मत प्रतिशत का ही विश्लेषण करें तो वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 33.13 प्रतिशत और कांग्रेस को 33.79 मत मिले। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हिस्से 46.50 प्रतिशत मत आए और कांग्रेस को मिले 33.50 प्रतिशत मत।

सपा और बसपा के उत्तराखंड में अब तक के चुनावी प्रदर्शन से साफ है कि अगर ये दोनों पार्टियां आगामी लोकसभा चुनाव में अपने गठबंधन को उत्तराखंड में भी आजमाती हैं, तो उसके लिए बहुत अधिक उम्मीदें नहीं हैं। दोनों को हासिल होने वाले मत भाजपा या कांग्रेस को मिलने वाले मतों के आगे कहीं नहीं ठहरते। 

अलबत्ता, राज्य की कुल पांच में से मैदानी भूगोल वाली दो लोकसभा सीटों हरिद्वार और नैनीताल में जरूर सपा-बसपा गठबंधन चुनाव समीकरण तय करने में अहम साबित हो सकता है लेकिन यह उन परिस्थितियों पर निर्भर करेगा कि गठबंधन होने पर सपा या बसपा के प्रत्याशी किस पार्टी के वोट बैंक में सेंधमारी करने में कामयाब होते हैं।

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