विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 05, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है उत्तराखंड

By Sunil NegiEdited By:
Published: Tue, 05 Jun 2018 08:36 AM (IST)Updated: Tue, 05 Jun 2018 09:45 PM (IST)

पर्यावरण संरक्षण के जरिये देश की आबोहवा को शुद्ध और सांस लेने लायक बनाने में उत्तराखंड अहम योगदान दे रहा है।

तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है उत्तराखंड
तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है उत्तराखंड

देहरादून, [केदार दत्त]: खुद तकलीफें झेलकर पर्यावरण संरक्षण के जरिये देश की आबोहवा को शुद्ध और सांस लेने लायक बनाने में उत्तराखंड अहम योगदान दे रहा है। नियोजन विभाग की ओर से इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर कराए जा रहे अध्ययन के प्रारंभिक आकलन को देखें तो विषम भूगोल वाला यह राज्य करीब तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। इसमें अकेले यहां के वनों का योगदान 98 हजार करोड़ के लगभग है।

71.05 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में जंगलों को सहेज पर्यावरण संरक्षण यहां की परंपरा का हिस्सा है। यही वजह भी है कि यहां के जंगल अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हैं। कुल भूभाग का लगभग 46 फीसद फॉरेस्ट कवर इसकी तस्दीक भी करता है। इससे न सिर्फ पहाड़ महफूज हैं, बल्कि पर्यावरण के मुख्य कारक हवा, मिट्टी व पानी भी। यही नहीं, गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम भी उत्तराखंड ही है। हर साल ही वर्षाकाल में बड़े पैमाने पर यहां की नदियां अपने साथ बहाकर ले जाने वाली करोड़ों टन मिट्टी से निचले इलाकों को उपजाऊ माटी देती आ रही है।

ऐसे में सवाल अक्सर उठता है कि आखिर यह राज्य सालाना कितने की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। पूर्व में इसे लेकर 107 बिलियन रुपये का अनुमान लगाया गया था, लेकिन बाद में राज्य सरकार ने खुद इसका आकलन कराने का निश्चय किया। नियोजन विभाग के जरिये इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर सालभर से यह अध्ययन चल रहा है। अब इसके प्रारंभिक आंकड़े सामने आने लगे हैं।

इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर चल रहे अध्ययन के नोडल अधिकारी मनोज पंत के मुताबिक राज्य के वनों से ही अकेले 98 हजार करोड़ रुपये की सालाना पर्यावरणीय सेवाएं मिलने का अनुमान है। जंगलों के साथ ही नदी, सॉयल समेत अन्य बिंदुओं को भी शामिल कर लिया जाए तो इन सेवाओं का मोल लगभग तीन लाख करोड़ से अधिक बैठेगा। उन्होंने कहा कि अभी अध्ययन चल रहा है और फाइनल रिपोर्ट आने पर ही पर्यावरणीय सेवाओं के मोल की असल तस्वीर सामने आएगी।

यह भी पढ़ें: ग्लोबल वार्मिग का असर, खतरे में साल के वृक्षों का अस्तित्व

यह भी पढ़ें: अब बुरांश के जल्दी खिलने के रहस्य से उठेगा पर्दा

यह भी पढ़ें: उत्तराखंड में किया जाएगा औषधीय और दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण