देहरादून, केदार दत्त। इसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की सख्ती का असर कहें अथवा सरकार की जनता की तकलीफों को दूर करने की कवायद। बात चाहे जो हो, लेकिन प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में जमा लीगेसी वेस्ट (पुराना एवं प्रत्यक्त कूड़ा) अब वेल्थ में बदलने जा रहा है। आठ शहरों में ऐसे 12 स्थल चिह्नित किए गए हैं, जहां ऐसे कूड़े के ढेर जमा हैं। इसके निस्तारण को 110 करोड़ की डीपीआर तैयार की गई है। अब ऐसे कूड़े से न सिर्फ आय होगी, बल्कि कूड़ाघर बनी भूमि खाली होने से इसे दूसरे उपयोग में लाया जा सकेगा।

एनजीटी ने पूर्व में एक मामले में सुनवाई करते हुए सभी राज्यों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमावली-2016 के तहत लीगेसी वेस्ट का ट्रीटमेंट कर इसके निस्तारण के निर्देश दिए थे। असल में विभिन्न स्थानों पर वर्षों से डंप हो रहा अथवा डंप कूड़ा न सिर्फ आसपास का वातावरण प्रदूषित कर रहा, बल्कि इससे उठती दुर्गंध ने लोगों का जीना मुहाल किया हुआ है। एनजीटी के निर्देश के बाद उत्तराखंड में भी हलचल हुई और फिर शुरू की गई ऐसे स्थल चिह्नित करने की कवायद।

शहरी विकास विभाग ने देहरादून, हरिद्वार, रुड़की, हल्द्वानी, श्रीनगर, मसूरी, काशीपुर व ऋषिकेश में ऐसे 12 स्थल चिह्नित किए। इनमें अधिकांश आबादी के नजदीक हैं। हालांकि, अब ऐसे स्थलों पर कूड़ा तो नहीं डाला जा रहा, मगर वहां वर्षों से डंप कूड़ा जनसामान्य के लिए मुसीबत बना हुआ है। इसके निस्तारण के मद्देनजर टाटा कंसल्टेंसी से डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कराई गई, जो 110 करोड़ की है।

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सूत्रों के अनुसार लीगेसी वेस्ट के निस्तारण को डीपीआर बनने के बाद अब यह कार्य पीपीपी मोड में विकासकर्ताओं को दिया जाएगा। इसके लिए कसरत चल रही है। ये तय हुआ है कि डंप कूड़े से जलने की क्षमता रखने वाला कूड़ा सीमेंट फैक्टियों को भेजा जाएगा, जिससे आय भी होगी। उप निदेशक शहरी विकास नीरज जोशी के अनुसार लीगेसी वेस्ट का निस्तारण होने पर खाली होने वाली भूमि का उपयोग पार्क, इंडस्ट्री अथवा दूसरे कार्यों के लिए किया जा सकेगा। अलबत्ता, नियमानुसार ऐसी भूमि में 10 साल तक खाद्यान्न अथवा बसागत नहीं की जाएगी।

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Posted By: Sunil Negi

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