देहरादून, विकास धूलिया। केंद्र व राज्य में सत्तासीन भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव में अपनी सत्ता के साथ ही साख बचाने की भी चुनौती है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में ही देखें तो भाजपा को अपना वर्ष 2014 का प्रदर्शन दोहराना होगा, क्योंकि तब पार्टी ने पांचों सीटों पर परचम फहराया था। यही नहीं, दो साल पहले हुए विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला था। लिहाजा, इस लोकसभा चुनाव में प्रदेश सरकार की भी अग्निपरीक्षा होगी क्योंकि कहीं न कहीं उसका दो साल का कामकाज मतदाताओं की कसौटी पर कसा जाएगा। यही वजह है कि प्रदेश भाजपा संगठन और सरकार प्रत्याशी चयन से लेकर कार्यकर्ताओं तक को साधने और मतदाताओं तक पहुंच बनाने में अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले प्रदेश सरकार में दायित्वों के बंटवारे को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है।

सत्ता में हिस्सेदारी की लालसा

यूं तो भाजपा उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के पहले से ही यहां मजबूत स्थिति में रही है लेकिन पिछले पांच सालों के दौरान पार्टी ने सूबे में पूर्ण वर्चस्व बनाया हुआ है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में पांचों सीटों पर जीत दर्ज की तो वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में 70 में से 57 सीटों पर जीत हासिल की। इसके ठीक उलट, कांग्रेस इस दौरान लगातार कमजोर हुई है। 

पांच साल में कांग्रेस के कई बड़े नेता दामन झटक कर भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा के पास विधानसभा में तीन-चौथाई से ज्यादा बहुमत है तो लाजिमी तौर पर पार्टी विधायकों और संगठन से जुड़े नेताओं में सत्ता में हिस्सेदारी की लालसा उभरनी ही थी। 

अब संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक उत्तराखंड में अधिकतम 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल ही हो सकता है लेकिन विधायकों की संख्या है 57। इनमें से 10 मंत्रिमंडल में हैं, जबकि दो विधायक विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष बनाए गए हैं।

नेताओं को साधने के लिए दायित्व

यानी, अब भी भाजपा के 40 से ज्यादा विधायक ऐसे हैं, जिनकी सत्ता में हिस्सेदारी की उम्मीद अभी पूरी नहीं हुई। हालांकि मंत्रिमंडल में दो स्थान रिक्त हैं लेकिन इनके लिए वरिष्ठ विधायकों की इतनी लंबी कतार है कि मुख्यमंत्री ने दो साल गुजरने के बाद भी इन रिक्त पदों को नहीं भरा। 

हालांकि संगठन से जुड़े नेताओं को जरूर ऐन लोकसभा चुनाव के मौके पर दायित्वों से नवाज दिया गया। दायित्व, यानी विभिन्न निगमों, समितियों, परिषदों के कैबिनेट व राज्यमंत्री स्तर के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पद। 

तीन किस्तों में अब तक 40 से ज्यादा भाजपा नेताओं को मंत्री स्तर के पदों के दायित्वों से नवाजा गया है। दरअसल, लोकसभा चुनाव को देखते हुए ही सरकार ने यह निर्णय लिया क्योंकि दो साल तक दायित्व न बंटने से पार्टी में अंदरखाने हलचल शुरू हो गई थी। लोकसभा चुनाव में सभी को एकजुट रखना प्रदेश सरकार और संगठन की जिम्मेदारी है, लिहाजा नेताओं को साधने के लिए उनकी मुराद पूरी कर दी गई।

सवाल, इससे कितना मिलेगा लाभ

इसके बावजूद अब पार्टी के बाहर और भीतर भी इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई है कि सरकार का यह कदम चुनाव में किस स्थिति तक मददगार साबित हो सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जिन भी नेताओं को दायित्व दिए गए हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे हैं, जिनका सियासी कद ऐसा नहीं कि वे बहुत बड़े मतदाता समूह को प्रभावित कर सकें। 

इनमें से अधिकांश दायित्वधारी संगठन से जुड़े रहे हैं, तो सांगठनिक क्षमता के लिहाज से तो वे पूरी तरह सक्षम हैं लेकिन आम जनता के बीच छवि और समर्थकों की फौज के पैमाने पर शायद ही इनमें से कोई खरा उतरता हो। 

वैसे, यह भी सच है कि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले दायित्व बंटवारे का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि इससे टिकट के कई दावेदारों का दावा खुद ही खत्म हो गया। इसके लिए तर्क यह कि जिस तरह किसी भी विधायक को दायित्व नहीं दिया गया, उसी तरह जिसे दायित्व दे दिया गया, वह लोकसभा टिकट की दौड़ से स्वत: ही बाहर हो गया।

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Posted By: Bhanu

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