देहरादून, जेएनएन। पौड़ी जिले में कल्जीखाल ब्लाक का सांगुड़ा गांव यूं तो दूसरे गांवों की तरह ही है, आसपास के सीढ़ीनुमा खेतों में उगी घास यह एहसास कराने के लिए काफी है कि नई पीढ़ी खेती से विमुख होती जा रही है, लेकिन सड़क से लगभग एक किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई के बाद गांव के अंतिम छोर पर नजारा बदल जाता है।

चारों ओर फैली हरियाली आंखों को सुकून देती है तो झूमते सेब, नारंगी और खुमानी के पेड़ों तले थकान भी काफूर हो जाती है। यह है मोती बाग। पास में 83 साल के एक बुजुर्ग बगीचे का जायजा ले रहे हैं। वे ही यहां के बागबां हैं। इस बागबां ने बारिश की बूंदों को वरदान में बदल युवाओं को प्रेरणा देती एक नई इबारत लिख डाली। उनके अथक संघर्ष की बदौलत आज यह गांव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना रहा है। मोती बाग पर बनी डाक्यूमेंट्री (वृत्त चित्र) ऑस्कर में धूम मचाने को तैयार है।

मोती बाग के बागबां विद्यादत्त शर्मा बताते हैं कि काश्तकारी का शौक कब जुनून बन गया पता ही नहीं चला। वह बताते हैं 'गांव में खेतों की दुर्दशा देख मन में पीड़ा होती थी। इसीलिए वर्ष 1964 में भू-माप विशेषज्ञ के पद से इस्तीफा दे दिया और गांव लौट आया।' वर्ष 1967 में उन्होंने अपने बिखरे खेतों को ग्रामीणों से बदल करीब ढाई एकड़ का एक चक बनाया। वह कहते हैं कि इतनी ऊंचाई पर पहाड़ की पथरीली जमीन को उर्वरक बनाना भी कोई हंसी खेल नहीं था।

जंगली जानवरों का भय अलग। विद्यादत्त बताते हैं कि शुरू में लोगों ने इसे उनकी सनक समझा, लेकिन धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई। बावजूद इसके सबसे बड़ी चिंता थी सिंचाई। सिवाए आसमान के कोई और जरिया नहीं था। उन्होंने इसका हल तलाशा बारिश के पानी में। उस दौर को याद करते हुए वह बताते हैं कि उन्होंने 20 फीट गहरा, 15 फीट लंबा और 10 फीट चौड़ा एक टैंक बनाया।

टैंक में बारिश का पानी एकत्र करने के लिए पहाड़ पर छोटी-छोटी नालियां बनाईं और ऐसी ही नालियां टैंक से बगीचे तक आती हैं।' वह कहते हैं नतीजा सबके सामने है। विद्यादत्त सिर्फ फल और सब्जी उत्पादन ही नहीं करते, मधुमक्खी पालन भी कर रहे हैं। वह कहते हैं कि पलायन की पीड़ा से कराह रहे पहाड़ों पर मरहम लगाने का इससे बेहतर तरीका और क्या होगा कि युवा खेती को रोजगार का जरिया बनाएं।

निर्मल को कचोटती थी पलायन की पीड़ा

'मोती बाग' पर डॉक्यूमेंट्री बनाने वाले निर्मल चंदर भी मूल रूप से पौड़ी जिले के दूणी गांव के रहने वाले हैं। वह अब तक 10 डॉक्यूमेंट्री का निर्माण कर चुके हैं। पलायन का दंश झेल रहे पहाड़ों की पीड़ा निर्मल को कचोटती थी। फोन पर दैनिक जागरण से बातचीत में उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में डेढ़ हजार से ज्यादा गांव जन विहीन हो चुके हैं।

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वह कहते हैं कि तरक्की के लिए पलायन जरूरी है, लेकिन स्थायी पलायन ने पहाड़ों को वीरान कर दिया है। विद्यादत्त शर्मा की कर्मठता उन्हें बचपन से ही प्रेरित करती थी। दरअसल, दोनों परिवार आपस में रिश्तेदार भी हैं। ऐसे में अब उन्हें अवसर मिला तो इस पर डॉक्यूमेंट्री बनाई।  निर्मल चंद की दो डॉक्यूमेंट्री को नेशनल अवार्ड भी मिल चुका है। केरल में आयोजित नेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल में 'मोती बाग' पुरस्कृत हो चुकी है।

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Posted By: Sunil Negi

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