Gyanvapi Masjid case : चौबीस साल पहले भी आया था ज्ञानवापी प्रकरण में सुनवाई पर फैसला, आज हाईकोर्ट में हुई सुनवाई, जानें पूरा प्रकरण...
वाराणसी में चौबीस साल पहले ज्ञानवापी मामले में पोषणीयता को लेकर मामला आ चुका है। इस मामले में आज 12 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई है। इस मामले को भी अदालत में चुनौती दी गई थी।

वाराणसी, जागरण संवाददाता। प्रथम अपर जनपद न्यायाधीश वाराणसी ने प्राचीन मूर्ति भगवान स्वयंभू विश्वेश्वर व अन्य तीन बनाम अंजुमन इंतजमिया मसाजिद कमेटी के मामले में आज से 24 साल पहले फैसला सुनाया था। निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया था।
1991के मुकदमे में दावा किया गया था कि विवादित परिसर में शिवलिंग है जो 2022 के सर्वे रिपोर्ट में साबित हो गया। तब 23 सितम्बर 1998 को तब आया था निर्णय अब दुसरे मामले में भी 12सितम्बर को आयेगा फैसला। फैसले की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने कहा था कि धार्मिक स्वरुप तय करने के लिए साक्ष्य जरुरी है। लिहाजा साक्ष्य लिए बिना आरंभिक स्तर पर पुरा मुकदमा या उसका कोई अंश निरस्त नहीं किया जा सकता।
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अपने 10 पेज के फैसले में एडीजे प्रथम रविंद्र नाथ मिश्र ने कहा था कि हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के दो प्रकार बताए गए हैं। इसमें से एक स्वयंभु है। इसका तात्पर्य होता है कि भगवान प्रकट हुए और दूसरा प्रतिष्ठित होते हैं। जिसका तात्पर्य है कि उस जगह पर भगवान की स्थापना होती है। जहां तक स्वयंभु का प्रश्न है यह अनादि काल से चला जाने वाला स्वरूप है जबकि प्रतिष्ठित के बारे में उसकी स्थापना का पता लगाया जाता है।
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15 अक्टूबर 1991 को सोमनाथ व्यास, राम रंग शर्मा ,हरिहर पांडे ने प्राचीन मूर्ति भगवान शंभू विश्वेश्वर की तरफ से अधिवक्ता मानबहादुर सिंह ,संकटा तिवारी के माध्यम से सिविल जज की अदालत में मुकदमा नंबर 610 सन 1991 दाखिल किया था। अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद को पक्षकार बनाया था। प्रकरण में मुकदमे की पोषणीयता के खिलाफ सिविल जज ने आदेश दिया था। वाद विन्दु दो मंदिर पक्ष के खिलाफ निर्णय दिया था। जिसके खिलाफ मंदिर पक्ष ने निगरानी दाखिल किया था। जिला जज से स्थानांतरित होकर प्रथम जिला जज के यहां निगरानी की सुनवाई हुई।
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अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू पक्ष के अनुसार विवादित परिसर मे शिवजी का लिंग स्वयंभु बताया जाता है। इसलिए उसकी स्थापना के संबंध में नहीं बल्कि उसके प्रगट होने के बारे में साक्ष्य एकत्र की जा सकती है। क्योंकि विवादित परिसर का एक बहुत पुराना इतिहास है। इसलिए समय में जो परिवर्तन हुए उनके बारे में साक्ष्य अपेक्षित है और बिना साक्ष्य के उस पर निर्णय देना उचित नहीं है।
धार्मिक स्वरूप एक ऐसा शब्द है जो धार्मिक भावनाओं से जुड़ा होता है। इसलिए धार्मिक स्वरूप निर्धारित करते समय परिसर की केवल इमारतों का स्वरूप नहीं देखा जाएगा। तब अदालत ने कहा था कि उपासना स्थल अधिनियम 1991 को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि 15 अगस्त 1947 को किसी भी उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप कैसा था वैसा ही बनाए रखने का प्रावधान किया गया है। इस धारा में यह महत्त्वपूर्ण है कि 15 अगस्त 1947 को किसी भी धार्मिक स्थल का स्वरूप क्या था।
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अगर यह विवादित है तो उपासना स्थल का धार्मिक स्वरुप विधि का प्रश्न नहीं है बल्कि विधि एवं साक्ष्य का मिलाजुला प्रश्न है। वादी मंदिर के अधिवक्ता का कहना है कि विवादित भवन में आज भी शिवलिंग स्थापित है ऐसे हैं साक्ष्य लिए जाने की आवश्यकता है। वादी हिंदु पक्ष का कहना है कि 15 अगस्त 1947 को विवादित परिसर मंदिर का ही था। जबकि प्रतिवादी गण के अनुसार उक्त तिथि को विवादित स्थल मस्जिद था। इसलिए दोनों पक्षों से साक्ष्य लेकर यह साबित हो सकेगा कि विवादित परिसर का स्वरूप क्या था।
पूरे वाद को या उसके किसी अंश को धार्मिक उपासना स्थल विशेष उपबंध नियमों के आधार पर निरस्त कर देना उचित नहीं है। इस मामले में केवल एक भवन ही विवादित नहीं है बल्कि एक बहुत बड़ा परिसर विवादित है। इसलिए धार्मिक स्वरूप तय करने में एक भवन तक सीमित नहीं रहा जा सकता बल्कि पूरे परिसर का धार्मिक स्वरुप तय होना है। अदालत ने निचली अदालत के के फैसले को निरस्त कर दिया जिसके खिलाफ मस्जिद पक्ष अंजुमन इंतजामिया ने हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल की है और जिसकी सुनवाई 12 सितंबर 2022 को हो रही है।
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