यूपी में बंदरों ने महिला पर किया हमला, छत से गिरकर हुई दर्दनाक मौत; परिवार में मची चीख-पुकार
शाहजहांपुर के कलान में बंदरों के हमले से जमुना देवी की छत से गिरकर मौत हो गई। वह कपड़े उतारने गई थीं। जिले में बंदरों के बढ़ते हिंसक हमलों से अब तक 13 ...और पढ़ें

जमुना देवी का फाइल फोटो
संवाद सूत्र जागरण, शाहजहांपुर। बंदरों के हमले से कलान के छिदकुरी गांव जमुना देवी की छत से गिरकर मृत्यु हो गई। जमुना छत पर सूख रहे कपड़े उतारने गई थी। जिले में हिंसक हो रहे बंदरों की वजह से आये दिन घटनाएं हो रही हैं। जिनमें तमाम लोगों की जान भी जा चुकी है लेकिन उसके बाद भी प्रशासन बंदरों को पकड़वाने के लिए ध्यान नहीं दे रहा है।
छिदकुरी गांव निवासी रामवीर राठौर की पत्नी जमुना देवी शाम को अपने दूसरी मंजिल की छत पर सूख रहे कपड़े उतारने के लिए गई थी। वहां बंदरों का झुंड पहुंच गया। बंदरों को देखकर वह घबरा गई। जैसे ही नीचे उतरने के लिए बढ़ी तो बंदरों ने हमला कर दिया जिससे वह छत से नीचे सड़क पर जा गिरी जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
रविवार को स्वजन ने पुलिस को घटना के बारे में बताया जिसके बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। उनके चार बेटे रूपेश, शोभित, दीपू, अजय व दो बेटियां उर्वशी व अमृता हैं। बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट तक को संज्ञान लेना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट आबादी क्षेत्र से बंदरों को पकड़वाकर जंगल में छोड़ने के सख्त निर्देश दे चुका है लेकिन उसके बाद भी निकायों से लेकर गांव स्तर पर प्रशासन ने अब तक कोई इंतजाम नहीं कराए हैं।
13 से अधिक लोगों की जा चुकी जान
जिले में हिंसक हो रहे बंदरों के हमले से जनवरी 2025 से अब तक 13 से अधिक लोगों की जान जा चुकी हैं। 20 दिसंबर को जलालाबाद के खाईखेड़ा गांव निवासी कृषक पवन यादव के डेढ़ वर्षीय बेटे अंश के हाथ से बंदर ने झपट्टा मारकर बिस्किट छीना तो उसकी अपनी मौसी की गोद से गिरकर मृत्यु हो गई।
इसी तरह 15 दिसंबर को परौर के दसिया गांव में बंदरों के हमले से छत से गिरकर जसवीर के 11 वर्षीय बेटे प्रशांत की मृत्यु हो गई थी। नौ दिसंबर को जैतीपुर के खेड़ारठ गांव में मकान का छज्जा गिरने से उमेश की मृत्यु हो गई थी।
चार नवंबर को रोजा के देवरास गांव में बंदरों के हमले से जिलेदार के चार वर्षीय बेटे कार्तिक की जान चली गई थी। इसी तरह तमाम अन्य घटनाएं हो चुकी हैं।
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यह है नियम
बंदर पकड़ने के लिए निकायों को वन विभाग से अनुमति लेनी होती है। इसके बाद अपने स्तर से संस्था तय कर बंदर पकड़वाकर जंगल में छुड़वाने होते हैं। ये प्रक्रिया वन विभाग की टीम की देखरेख में होती है, ताकि किसी प्रकार की क्रूरता न हो।

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