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    Maha Kumbh 2025: संगमनगरी में नागा साधुओं की युद्ध कला ने मोहा मन, विदेशी मेहमान भी हुए अभिभूत; देखें तस्वीरें

    Updated: Sun, 15 Dec 2024 12:44 PM (IST)

    महाकुंभ 2025 में नागा साधुओं ने अपनी युद्ध कला और अखाड़ेबाजी का अद्भुत प्रदर्शन किया। लाठी भांजते तलवार चलाते और बरछी फेंकते हुए नागा साधुओं ने हर-हर महादेव के जयघोष के साथ छावनी प्रवेश किया। विदेशी मेहमान भी इस अद्भुत नजारे को देखकर अभिभूत हो गए। विदेश में योग व वैदिक संस्कृति का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। इसके जरिए वह स्वयं का जीवन सुधार रहे हैं।

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    महाकुंभ मेला क्षेत्र में श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़े के छावनी प्रवेश में शामिल महामंडलेश्वर।-जागरण

     जागरण संवाददाता, प्रयागराज। नागा साधुओं का युद्ध कौशल, अखाड़ेबाजी और दांव पंच का प्रदर्शन छावनी प्रवेश के दौरान विशेष आकर्षण रहा। लाठी भांजते, तलवार, बरछी चलाने की करला हर-हर महादेव के जयघोष के बीच दिखाई जाती रही। एक दूसरे के ऊपर खड़े होकर नागा साधु तलवारें भांजते रहे।

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    सड़क पर साधुओं का जौहर दिखा। युद्ध करला का प्रदर्शन मौज गिरि आश्रम से महाकुंभ मेला क्षेत्र में शिविर छावनी तक होता रहा। साधुओं का यह जलवा देखने के लिए बड़ी संख्या में लोगों का जमावड़ा रहा। वहीं घोड़ों पर बंधे ढोल पीटकर माहौल को रास्ते भर भक्तिमय बनाया।

    यह परंपरा रही है कि माधकुंभ मेलों में श्रीपंच दशनाम जूना अखाड़े के छावनी प्रवेश के दौरान युद्ध कला से अवगत कराया जाए। इससे पहले भी जितने दिनों से मौज गिरि आश्रम में नागाओं का डेरा रहा, छोटे-छोटे शिविरों में युद्ध के तमाम अस्त्र-शस्त्र का अभ्यास होता रहा।

    भाला, चरणी, तलवार, लाठी, कटार आदि से लैस साधुओं ने दिखाया कि सनातन धर्म पर आंच आएगी तो विरोधियों को सबक सिखाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

    यात्रा में देश-दुनिया से आए करीब पांच हजार से अधिक नागा संन्यासियों ने हिस्सा लिया। इस दौरान रूस की राजधानी मास्को से आयीं जूना अखाड़ा की महामंडलेश्वर मां आनंदमयी ने कहा कि दुनिया भारत की और आशाभरी नजरों से देख रही है। विदेश में योग व वैदिक संस्कृति का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। इसके जरिए वह स्वयं का जीवन सुधार रहे हैं।

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    महाकुंभ वह अद्भुत आयोजन है जिसमें विदेश के लोग आत्म मंथन के लिए प्रयागराज आएंगे। यहां जप-तप करके स्वयं को कृतार्थ करेंगे। यह पूरी दुनिया में अनोखा कुंभ है। इतनी भव्यता और दिव्यता कहीं नहीं देखी। इनको इस पल का काफी दिनों से इंतजार था, जो आज जाकर पूरा हुआ।

    महाकुंभ मेला क्षेत्र में श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़े के छावनी प्रवेश में शामिल किन्नर अखाड़े के संन्यासी।-जागरण


    साधुओं का अंदाज देख मेहमान आह्वादित

    विदेशी मेहमानों और पर्यटकों का महाकुंभ मेला क्षेत्र में आने का सिलसिला शुरू हो चुका है। विभिन्न देशों के नागरिक शनिवार को जूना अखाड़ा के छावनी प्रवेश में भी दिखे। नीदरलैंड, आस्ट्रेलिया, फ्रांस से भी आए पर्यटकों ने पूरे भक्तिभाव से नागा साधुओं की इस यात्रा में भागीदारी की।

    जापान की येागमाता आइकावा


    प्रयाग के कण-कण में भक्ति का सार प्रवाहमान : आइका

    त्याग, समर्पण व परोपकार की घरा भारत की पवित्र भूमि दुनियाभर को आकर्षित करती है। उममें भी तीर्थराज प्रयाग की आध्यात्मिक ओज हर किसी को खींच लाती है। जूना अखाड़ा की महामंडलेश्वर योगमाता केको आइकावा भी यहां आकर अभिभूत हो गई।

    कहती हैं धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का सार्थक स्वरूप भारत में विद्यमान है। इसके कण- योगमाता कण में भक्ति का सार व आत्मसंतुष्टि का भाव प्रवाहमान है, जिसका आधार सनातन धर्म है। सनातन धर्म के संस्कार व संस्कृति की परंपरा वैज्ञानिक है। या यूं कहें कि उससे भी आगे की बात करते हैं वेद-पुराण।

    महाकुंभ मेला क्षेत्र में श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़े के छावनी प्रवेश में शामिल रसियन महामंडलेश्वर आंनदमयी माता। जागरण


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    जापान की राजधानी टोक्यो में योग व ध्यान का केंद्र चलाने वली आइकावा कहती हैं कि दुनिया को सनातन धर्म की व्यापकता से जोड़ा नहीं गया। उस दिशा में अब प्रयासल रहा है, जिसका व्यापक असर देखने को मिल रहा है। इससे आज दुनिया भारत की तरफ आशाभरी नजरों से देख रही है।

    श्रीपंच दशनाम जूना अखाड़ा का छावनी प्रवेश में आचार्य महामंडलेश्वर अवदेशानंद गिरि।


    कहा मेरे गुरु महामंडलेश्वर ब्रह्मलीन पायलट बाबा ने वैदिक ज्ञान व संस्कार का सार्थक स्वरूप विभिन्न देशों में प्रस्तुत किया था, जिसकी वजह से लोग सनातन धर्म से तेजी से जुड़े। उसी का प्रभाव है कि हर कोई उससे जुड़ने को लालायित है। महाकुंभ में तमाम लोग सनातन धर्म से जुड़ेंगे। जूना अखाड़ा ने 2007 में आइकावा को महामंडलेश्वर पद की उपाधि प्रदान की।