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Prayagraj Church : अद्भुत वास्तुकला के प्रतीक हैं संगम नगरी के चर्च, आइए जानें चर्चों का इतिहास व स्वर्णिम यात्रा

By Jagran News Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Sun, 21 Dec 2025 01:27 PM (IST)

Prayagraj Church प्रयागराज के चर्च अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं। आल सेंट कैथेड्रल और सेंट जोसेफ चर्च विश्वविख्यात ...और पढ़ें

Prayagraj Church प्रयागराज के ऐतिहासिक आल सेंट कैथेड्रल चर्च (पत्थर गिरजा घर) वास्तुकला का अद्भुत संगम हैं। जागरण

Prayagraj Church प्रयागराज के ऐतिहासिक आल सेंट कैथेड्रल चर्च (पत्थर गिरजा घर) वास्तुकला का अद्भुत संगम हैं। जागरण

HighLights

  1. आल सेंट कैथेड्रल यानी पत्थर गिरजाघर व सेंट जोसफ चर्च की प्रसिद्धि है विश्वविख्यात

  2. ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टि से चर्चों की रोचकता लोगों को और भी उत्सुक करने वाली है

अमरदीप भट्ट, प्रयागराज। Prayagraj Church मसीही समुदाय के आराध्य यीशु मसीह का जन्मोत्सव क्रिसमस 25 दिसंबर को मनाया जाएगा। संगम नगरी के सभी मसीही उल्लासित हैं। घरों के साथ आराधना स्थल चर्चों को सजाया-संवारा जा रहा है। वैसे बात चर्चों की करें तो उनकी वास्तुकला अद्भुत है। प्रयागराज के अनेक चर्च हर किसी के आकर्षण का केंद्र हैं। इसका प्रमुख कारण उनकी वास्तुकला है। इनकी निर्माण शैली की प्राचीन कला के उदाहरण हैं।

अन्य धर्माें के लोगों का भी ध्यान आकृष्ट करती है

Prayagraj Church इन चर्चों में आल सेंट कैथेड्रल यानी पत्थर गिरजाघर व सेंट जोसफ चर्च की प्रसिद्धि तो विश्वविख्यात है। ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से चर्च के बारे में जानेंगे तो इनकी रोचकता आपको और भी उत्सुक करने वाली है। सांस्कृतिक परिदृश्य में चर्च प्रयागराज की अनोखी धरोहर हैं और इनमें हर साल होने वाली सजावट अन्य धर्मों के लोगों का भी ध्यान खींचती है।  

40 एकड़ में स्थित है सेंट पीटर्स चर्च

म्योराबाद चर्च के नाम से आप जिसे जानते हैं वह मसीही समुदाय की कई साल की मेहनत और चंदे से 1858 में जुटाई गई 25 हजार रुपये रकम का परिणाम है। इसे सेंट पीटर चर्च नाम दिया गया जो आज आकर्षण और आस्था का केंद्र है। 40 एकड़ के विशाल क्षेत्र में बने इस चर्च का बाहरी हिस्सा मनमोहक है भीतरी बनावट भी उतनी ही सुंदर है।

यीशु के क्रूस की आकृति पर आधारित है यह चर्च 

सेंट पीटर चर्च को आगरा और सिकंदराबाद से आए मसीही समुदाय के लोगों ने लार्ड मेयर की मदद से बनवाया था। चर्च यीशु के क्रूस की आकृति पर आधारित है। आगरा और सिकंदराबाद से  वर्ष 1858 में काफी संख्या में मसीही इलाहाबाद आए थे। म्योराबाद के आस-पास का क्षेत्र उनकी शरणस्थली बना। तब यहां प्रार्थना के लिए किसी चर्च की व्यवस्था नहीं थी।

चंदे से बना था म्योराबाद चर्च

इस म्योरोबाद चर्च बनवाने के लिए सबने चंदा करना शुरू किया। कई साल में 25 हजार रुपये एकत्र हो पाए। फिर सवाल सभी के सामने था कि चर्च बने कहां। तब लार्ड मेयर ने 40 एकड़ जमीन दान में दी। इसके बाद 17 मई 1872 को लार्ड विलियम म्योर ने म्योराबाद चर्च की नींव रखी। तीन साल में चर्च बनकर तैयार हो गया। बाद में इसी के नाम पर म्योराबाद क्षेत्र का विकास हुआ।

कौन थे इस चर्च के पहले पादरी 

चर्च के प्रथम पादरी डेविड मोहन थे। इनके बाद कई अन्य पादरियों ने चर्च में विशेष रूप से तैयारी पूर्ण की। इसमें पवित्र भोज, आम लोगों को बैठने के लिए अलग व्यवस्था की गई है।
चर्च के पादरी प्रवीण मैसी बताते हैं कि क्रिसमस महोत्सव शुरू हो गया है। क्रिसमस ट्री, सिंगिंग व कैंडल लाइट जैसे आयोजन निरंतर हो रहे हैं। 24 दिसंबर की रात आतिशबाजी व बोन फायर कर खुशियां मनाई जाएंगी। 25 दिसंबर की सुबह विशेष प्रार्थना होगी। 26 दिसंबर को खेलकूद समारोह का आयोजन होगा।    

कटरा का लाल चर्च सलीब जैसा

Prayagraj Church अब आपको ले चलते हैं कटरा के निकट लाल चर्च की ओर। लाल रंग के इस भवन की बनावट सलीब के जैसी है। यीशु मसीह को सलीब पर लटकाकर यातना दी गई थी। यह चर्च ब्रिटिश काल में वर्ष 1901 में बनकर हुआ था। कटरा चर्च के निर्माण की आधारशिला वर्ष 1900 में जोसेफ वारेन ने रखी थी। एक साल में यह बनकर तैयार हो गया। चर्च की स्थापना में जेम्स एम अलेक्जेंडर (1865-1902) की महती भूमिका थी, जिसके चलते मार्च 1901 में उन्हें समर्पित करते हुए चर्च में प्रार्थना की शुरूआत की गई।

पहले कटरा मिशनरी में वर्ष 1871 से प्रार्थना होती थी

इस चर्च के बनने से पहले कटरा मिशनरी में वर्ष 1871 से प्रार्थना होती थी। कटरा और आसपास रहने वाले मसीही समुदाय के लोग यहां इसमें प्रार्थना करने के लिये आते थे। समय की जानकारी देने के लिए इस चर्च में एक बड़ी सी घंटी लगाई गई। यह घंटी काफी वर्षों के बाद टूट गई तो उसकी जगह पर 1990 में दूसरी घंटी लगाई गई। चर्च के पादरी फादर मनीष गुंजन जैदी ने बताया कि चर्च परिसर में 2018 में चबूतरे का निर्माण कराया गया।

क्या है इस चर्च की विशेषता?

भारतीय क्रिश्चियन ही यहां प्रार्थना करने आते थे। इस चर्च की एक और विशेषता है की यहां भारतीय क्रिश्चियन ही पुजारी बनाये जाते थे। शुरू में अंग्रेज भी आते थे लेकिन बाद में आना बंद कर दिया तो पूरी तरह से चर्च पर भारतीयों का एकाधिकार हो गया।

चर्च के सामने है मिशन रोड

वर्ष 1856 तक बाइबिल सोसाइटी आफ इंडिया का कार्यालय मिशनरी होने के कारण चर्च के सामने की रोड को मिशन रोड कहा जाता है। 1856 में बाइबिल सोसाइटी ऑफ इंडिया का कार्यालय यहीं पर था जो अब सिविल लाइंस में है। चर्च प्रबंध समिति में 200 स्थायी सदस्य हैं। चर्च के मुख्य हाल में लगभग दो सौ लोग एक साथ बैठकर प्रार्थना कर सकते हैं।

गोथिक वास्तुकला है पत्थर गिरजाघर का आकर्षण

Prayagraj Church सिविल लाइंस में महात्मा गांधी मार्ग की शुरुआत हाई कोर्ट के निकट आल सेंट कैथेड्रल यानी पत्थर गिरजाघर से होती है। शहर का यह सबसे विशाल और खूबसूरत गिरजाघर गोथिक वास्तु कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। पत्थरों से बने इस ऐतिहासिक चर्च को लोग पत्थर गिरजाघर के नाम से जानते हैं। क्रिसमस व अन्य अवसरों पर यहां प्रार्थना के लिए काफी भीड़ होती है। यह गिरजाघर पर्यटन की दृष्टि से भी प्रयागराज के बेहतरीन स्थलों में है।

एशिया के बेहतरीन चर्चों में से एक है पत्थर गिरजाघर

आल सेंट्स कैथेड्रल अपनी बेहतरीन बनावट के चलते एशिया के सबसे ज्यादा चर्चित चर्चों में माना जाता है।इस गिरजाघर की डिजाइन 1871 में विख्यात ब्रिटिश वास्तुकार सर विलियम एमर्सन ने तैयार की थी जिन्हेंं विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता और म्योर सेंट्रल कालेज इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की डिजाइन बनाने का भी श्रेय दिया जाता है। 1887 में इसका निर्माण शुरू हुआ था व चार साल में तैयार हो गया था। ब्रिटिश काल में बने इस गिरजाघर की इमारत में क्रीम और लाल रंग के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है।

संगमरमर का आल्टर, मेजेक वर्क आदि करते हैं आकर्षित 

इसमें संगमरमर का आल्टर, मोजेक का काम, स्टेंड ग्लास के पैनल लोगों को आकर्षित करते हैं। चर्च की पल्पिट (प्रार्थना पढने की जगह) काफी भव्य है। बलुआ पत्थर से निर्मित मेहराब व हरियाली से परिपूर्ण लॉन चर्च को दर्शनीय बनाते हैं। कैथेड्रल रविवार को सुबह शाम तक खुला रहता है। 400 लोग इसमें एक साथ बैठकर सकते हैं ।

विशाल प्रार्थना सभागार

Prayagraj Church इसका प्रार्थना सभागार 40 फीट चौड़ा और 130 फीट लंबा है जबकि चर्च की कुल लंबाई 240 फीट और चौड़ाई 56 फीट है। इसमें प्रवेश के लिए दक्षिण व उत्तर दिशा में दो बड़े दरवाजे हैं। तीन टावर बने हैं जिनमें तत्कालीन इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया को भी एक टावर समर्पित है। चर्च की इमारत के चारों तरफ पेड़ और फूल लगे हुए हैं जो इमारत की खूबसूरती को और भी बढ़ाते हैं।

यूरोपियन वास्तुकला की एक खास शैली है गोथिक

डाॅ. अमिताभ राय बताते हैं कि गोथिक वास्तु शैली यूरोप में उत्तर मध्य काल में प्रचलित थी। 12वीं सदी में यह शैली फ्रांस में जन्मी। मेहराब, रिब्ड वाल्ट्स और पत्थरों की संरचना इस वास्तु शैली की विशेषता है। इस वास्तु शैली पर ब्रिटिश भारत में कई चर्चों का निर्माण हुआ था जो आज भी मौजूद हैं। 

इटैलियन वास्तुकला का नमूना है सेंट जोसेफ चर्च

सिविल लाइंस सेंट जोजफ कैथेड्रल चर्च इटैलियन वास्तुकला का नायाब नमूना है। अपने में स्वर्णिम इतिहास समेटे यह चर्च वास्तुकला के लिए जाना जाता है। यीशु की सूली लेकर चलती हुई प्रतीत होने वाली प्रतिमा इस बात का प्रतीक है कि बुराई से लड़ने के लिए अच्छाई को सूली तक भी जाना पड़ता है।

बिशप हारमन ने 1879 में रखी थी चर्च की नींव

सेंट जोसेफ कैथेड्रल चर्च पूरे देश में अपनी भव्यता और आकर्षण के लिए जाना जाता है। रोमन कैथोलिक डायसिस आफ इलाहाबाद का यह महत्वपूर्ण चर्च है। इसमें दो हजार से अधिक सदस्य हैं। इस चर्च के निर्माण की नींव बिशप हारमन ने 1879 में रखी थी। इसके लिए वह मुंबई से प्रयागराज तक बैलगाड़ी से आए थे। उन्हें यहां पहुंचने में तीन माह 29 दिन का समय लगा। हारमन की मंशा के अनुरूप चर्च को इटैलियन कलाकृति व रंगों से सजाया गया। इसका निर्माण पूरा होने में 10 वर्ष लग गए थे। 1889 में बिशप ग्रामिन ने इस चर्च का शुभारंभ किया।

12 फीट लंबा प्यानो आकर्षण का केंद्र

चर्च में 12 फीट लंबा प्यानो पहली नजर में ही ध्यान खींचता है। यह प्यानो इटली से लाया गया था। इसे पाइप से बजाया जाता है। कहा जाता है कि ऐसा प्यानो पूरे प्रदेश में अकेला है। हालांकि बीते एक दशक से खराब होने के कारण इसका मधुर संगीत सुना नहीं जा सकता है।

24, 25 दिसंबर को होंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम

इस चर्च में क्रिसमस के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होगा। 24 व 25 दिसंबर को भव्य प्रार्थना सभा होगी। सांस्कृतिक कार्यक्रम में हर जाति-धर्म के लोगों को आमंत्रित किया गया है। 

आठ स्तम्भों पर बना है होली ट्रिनिटी चर्च

होली ट्रिनिटी एक महत्वपूर्ण एंग्लिकन गिरजाघर है। इसका निर्माण 1839 में लेफ्टिनेंट शार्प ने करवाया था और मेजर स्मिथ ने औपनिवेशिक गोथिक वास्तुकला में इसका डिजाइन तैयार किया था। 125 फीट लंबे और 70 फीट चौड़े आठ स्तंभों पर बना गिरजाघर लंदन के सेंट मार्टिन-इन-द-फील्ड्स गिरजाघर जैसा दिखता है। यहां आने वाले पर्यटक अंग्रेजी में आयोजित होने वाली प्रार्थना सभाओं और शांत वातावरण की सराहना करते हैं।

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