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    अखाड़ों का संसार: सेवा कार्यों की अनदेखी पर चलता है 'सरकार का चाबुक', श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा की अनोखी कहानी

    Maha Kumbh Mela 2025 निर्मोही अनी अखाड़ा सेवा कार्यों के लिए जाना जाता है। अखाड़े के संतों के लिए सेवा कार्य अनिवार्य है। सेवा कार्य न करने वालों पर सरकार का चाबुक चलता है। अखाड़े ने जुलाई 2024 से दिसंबर तक कई संतों को निष्कासित किया है। अखाड़ा प्रतिवर्ष सेवा कार्यों की गुप्त जांच करवाता है। इसमें निष्क्रिय रहने वाले निष्कासित किया जाता है।

    By Sharad Dwivedi Edited By: Vivek Shukla Updated: Fri, 27 Dec 2024 05:04 PM (IST)
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    Maha Kumbh 2025 श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा के संतों को संबोधित करते अध्यक्ष श्रीमहंत राजेंद्र दास। जागरण

    जागरण संवाददाता, महाकुंभनगर। सनातन धर्म की रक्षा को शस्त्र उठाने वाले अखाड़ों में सेवा सर्वोपरि है। गुरु की सेवा संन्यास की पहली साीढ़ी है। पद बढ़ने के साथ सेवा का स्वरूप व्यापक हो जाता है। गऊ सेवा, निश्शुल्क वैदिक शिक्षा दिलाने को विद्यालय का संचालन, प्रवचन से सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार, निश्शुल्क चिकित्सा शिविर लगाना उसमें समाहित हैं। श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा सेवा कार्यों से समझौता नहीं करता।

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    अखाड़े के प्रमुख संतों, जगदगुरु व महामंडलेश्वरों को सेवा कार्यों का संचालन अनिवार्य है। इसकी अनदेखी करने वालों पर चलता है 'सरकार का चाबुक' (निष्कासन की कार्रवाई)। इसका पालन न करने पर अखाड़े ने जुलाई 2024 से दिसंबर माह तक नासिक के महामंडलेश्वर जयनेंद्रानंद दास, चेन्नई के महामंडलेश्वर हरेंद्रानंद, अहमदाबाद के महंत राम दास, उदयपुर के महंत अवधूतानंद, कोलकाता के महंत विजयेश्वर दास निष्कासित कर दिया। वहीं, सूरत के मंडलेश्वर विजयानंद दास, पटना के देवराजेश्वर दास को निष्कासित किया है। अखाड़ा प्रतिवर्ष सेवा कार्यों की गुप्त जांच करवाता है। इसमें निष्क्रिय रहने वाले निष्कासित किया जाता है।

    श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़े के संत युद्ध कौशल में परांगत माने जाते हैं। स्वामी बालानंदाचार्य ने इसकी स्थापना 1477 ईस्वी में की। वैष्णव सम्प्रदाय के इस अखाड़े के संतों ने मुगल आक्रांताओं व अंग्रेजों से युद्ध किया। मोहम्मद गौरी जैसे आक्रांता से अखाड़े के संतों ने लड़ाई लड़ी है। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को अंतिम समय में अंग्रजों से बचाने में उनकी मदद की थी।

    Maha Kumbh 2025: संगम का विहंगम दृश्य।-जागरण


    संतों ने अंग्रेजों से उनकी रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। अंग्रेजों को परास्त कर वापस भेज दिया। स्थापना काल में अखाड़े के संत अयोध्या, मथुरा, नैमिषारण्य, हरिद्वार, ऋषिकेश सहित अनेक क्षेत्रों में प्रवास करके मठ-मंदिरों की रक्षा करते थे। मौजूदा समय अखाड़े का विस्तार देशभर में है। यह अखाड़ा सनातन धर्म की रक्षा के लिए देशभर में फैली अपनी शाखाओं के जरिए उसका प्रचार-प्रसार करने में जुटा है।

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    निर्णायक होते हैं 'सरकार'

    निर्मोही अनी अखाड़ा में सरकार निर्णायक होते हैं। अखाड़े के अध्यक्ष, मंत्री व पंच परमेश्वर की टीम को अखाड़े की सरकार की पदवी दी गई है। जो सबसे शक्तिशाली है। संतों के विवाद से लेकर अखाड़े में किसे जोड़ना है और किसे हटाना है? उसका निर्णय सरकार लेते हैं। इनकी कार्रवाई को 'सरकार का चाबुक' कहा जाता है।

    खासबात यह है कि सरकार का निर्णय अकाट्य होता है। बाद में यह स्वयं अपना निर्णय नहीं बदल पाते। यही कारण है कि अधिकतर विवाद नीचले स्तर पर निस्तारित कर दिए जाते हैं। विषम परिस्थिति मामला सरकार के पास आता है। सरकार के बैठने पर पक्ष अथवा विपक्ष में निर्णय सुनाना अनिवार्य है।

    संत के पक्ष में निर्णय आता है तो उसे 'सरकार की संवेदना' कहा जाता है। वहीं, संत को दंडित करने की कार्रवाई को 'सरकार का चाबुक' कहते हैं। इनकी बैठक वर्ष में दो बार जनवरी व जुलाई माह में होती है। अगर कहीं कुंभ-महाकुंभ का आयोजन होता है तो बैठक एक-दो महीने आगे-पीछे कर ली जाती है।

    Maha Kumbh 2025:चौफटका आरओबी से गुजरता श्री शंभू पंच अग्नि अखाड़ा की छावनी प्रवेश शामिल हाथी। जागरण


    शास्त्र के साथ शस्त्र की शिक्षा

    निर्मोही अनी अखाड़ा के गठन के बाद उसका केंद्र अयोध्या, हरिद्वार के आस-पास का क्षेत्र था। वहां संतों की छोटी-छाेटी छावनी बनाई गई। अखाड़े से जुड़े संतों को छावनी में भाला, तलवार, त्रिशूल चलाने का प्रशिक्षण के साथ शास्त्र का ज्ञान कराया जाता था। यह परंपरा आज भी जारी है। अखाड़े के नागा संतों को बंदूक, त्रिशूल, भाला व तलवार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

    सेवा के जरिए मतांतरण के खिलाफ मुहिम

    निर्मोही अनी अखाड़ा मौजूदा समय मतांतरण रोकने व वैदिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार की मुहिम में लगा है। इसके लिए अखाड़े ने सेवा कार्य को अनिवार्य बनाया है। देश-विदेश के समस्त महामंडलेश्वरों व जगदगुरु के लिए संस्कृत विद्यालय, गोशाला का संचालन, पहाड़ी व पिछड़े इलाकों में चिकित्सा शिविर लगाकर वहां के लोगों को वस्त्र, खाने-पीने की सामग्री देने का निर्देश है।

    जिन संतों को जगदगुरु व महामंडलेश्वर बनाया जाता है उनसे सेवा कार्य कराने का लिखित आश्वासन लिया जाता है। दो-तीन वर्ष बाद उसकी जांच कराई जाती है। अखाड़े की नीतियों के अनुरूप काम न करने पर संबंधित पदवी वाले संतों को निष्कासित कर दिया जाता है।

    शाखाएं हैं ताकत

    निर्मोही अनी अखाड़ा की नौ शाखाएं हैं। जो उसकी ताकत है। हर शाखा में 20 हजार से अधिक संत हैं। जो अलग-अलग प्रदेशों में सेवा कार्य में लीन हैं। शाखाओं से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय निर्मोही अखाड़ा के पदाधिकारी लेते हैं। शाखाओं के मुखिया के साथ समस्त प्रमुख निर्णय वही लेते हैं।

    Maha Kumbh 2025: चकिया मोहल्ले से गुजरता श्री शंभू पंच अग्नि अखाड़ा की छावनी प्रवेश जुलूस में शामिल संत-महात्मा। जागरण


    इसमें प्रमुख हैं

    • अखिल भारतीय श्री रामानंदी निर्मोही अखाड़ा
    • अखिल भारतीय श्री झाडिया निर्मोही अखाड़ा
    • अखिल भारतीय श्री रामानंदी संतोषी निर्मोही अखाड़ा
    • अखिल भारतीय हरव्यासी संतोषी निर्मोही अखाड़ा
    • अखिल भारतीय श्री रामानंदी महानिर्माणी निर्मोही अखाड़ा
    • अखिल भारतीय श्री हरव्यासी महानिर्माणी रामानंदी निर्मोही अखाड़ा
    • अखिल भारतीय श्री विष्णु स्वामी निर्मोही अखाड़ा
    • अखिल भारतीय श्री मालाधारी निर्मोही अखाड़ा
    • अखिल भारतीय श्री राधावल्लभी निर्मोही अखाड़ा

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    यह है खास

    • इष्टदेव : हनुमान जी
    • धर्मध्वजा : सफेद रंग उसमें हनुमान जी का चित्र
    • आश्रम : प्रयागराज, अयोध्या, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन, अहमदाबाद
    • मुहिम : मतांतरण रोकना, वैदिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार, गाय की रक्षा

    हमारे अखाड़े में हर संत के लिए सेवा कार्य अनिवार्य है। भले कोई कितने भी बड़े पद पर क्यों न हो, सेवा कार्य न कराने पर उसके खिलाफ कार्रवाई होती है। इसके तहत कई मंडलेश्वर व महामंडलेश्वर निष्कासित किए गए हैं। अखाड़े में अनुशासन बनाए रखने के लिए समय-समय पर सबकी कार्यप्रणाली की गुप्त जांच कराई जाती है। ठोस साक्ष्य के आधार पर कार्रवाई की जाती है। -श्रीमहंत राजेंद्र दास, अध्यक्ष श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा