इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला, दाखिल खारिज से नहीं बदलेगा भूमि का स्वामित्व
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि दाखिल खारिज प्रविष्टि का भूमि के स्वामित्व पर कोई असर नहीं पड़ता। स्वामित्व का निर्धारण सिविल ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि दाखिल खारिज प्रविष्टि का भूमि के स्वामित्व पर कोई असर नहीं पड़ता है। स्वामित्व निर्धारण पर सिविल कोर्ट स्वतंत्र रूप से निर्णय लेता है। दाखिल खारिज कार्यवाही संक्षिप्त प्रक्रिया है। कुछ अपवादों में ही याचिका दाखिल की जा सकती है अन्यथा दाखिल खारिज कार्यवाही के खिलाफ याचिका पोषणीय नहीं है।
याची का दावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय अपवादों से आच्छादित नहीं है इसलिए हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने बस्ती निवासी गंगाराम मिश्र की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा है कि कोई असाधारण परिस्थिति नहीं है। सिविल कोर्ट में प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है। सिविल या रेवेन्यू कोर्ट/ अथारिटी मामले में गुण-दोष पर फैसला लेगा और इस कोर्ट की किसी भी टिप्पणी से प्रभावित नहीं होगा।
यूपी रेवेन्यू कोड, 2006 की धारा 34, 35(2) और 210 के तहत पारित आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। उक्त आदेश क्रमशः तहसीलदार, एसडीएम और अतिरिक्त आयुक्त ने दिए थे। विवाद बस्ती जिले की भानपुर तहसील के छितिरगवां गांव में स्थित कृषि भूमि से संबंधित है। तथ्यों के अनुसार 25 जुलाई, 2016 को याची के भाई तुलसीराम ने सुशीला देवी के पक्ष में बैनामा किया।
याची का कहना है कि भूमि विभाजन बिना अपने हिस्से से अधिक का बैनामा किया गया है। इसी तारीख पर याची की मां ने याची के पक्ष में रजिस्टर्ड वसीयत की थी। दूसरी तरफ बैनामे के आधार पर दाखिल खारिज की कार्यवाही शुरू की गई। सुशीला के पक्ष में 18 अक्टूबर, 2021 के आदेश से इसकी अनुमति दी गई।
याची ने रिकाल अर्जी देकर आपत्तियां दायर कीं लेकिन पांच फरवरी 2024 को तहसीलदार ने आपत्ति निरस्त कर दाखिल खारिज इंद्राज की पुष्टि की। धारा 35(2) के तहत याची की अपील 18 जुलाई, 2024 को खारिज कर दी गई थी। गंगा राम व उसकी मां द्वारा दायर मूल मुकदमा जिसमें स्वामित्व के निर्धारण और बिक्री विलेख को चुनौती देने की मांग है वह सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के समक्ष लंबित है।
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याची का कहना था कि दाखिल खारिज आदेश अवैध हैं क्योंकि बिक्री विलेख हस्तांतरणकर्ता के हिस्से से अधिक और बिना बंटवारे के निष्पादित किया गया था और अधिकारियों ने आपत्तियों पर विचार नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि याचिका स्वीकार करने से सिविल कोर्ट में चल रहे मामले को दरकिनार किया जा सकता है, जिससे अनावश्यक रूप से प्रक्रियाएं बढ़ेंगी और दाखिल खारिज की संक्षिप्त प्रकृति को कमजोर किया जाएगा। इंद्राज के रिकार्ड का भूमि स्वामित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और सिविल कोर्ट स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती है।

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