MDA में 'मेहरबानी' का खेल: 13 लाख महीने वाली एजेंसी और चहेते ठेकेदारों पर उठ रहे बड़े सवाल!
मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (एमडीए) में निविदाओं और कार्यों के आवंटन में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठे हैं। एक निजी एजेंसी को हर महीने 13 लाख रुपये ...और पढ़ें

मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (एमडीए)
जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (एमडीए) में निविदाओं के नाम पर चल रहे कथित खेल को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सड़क निर्माण से लेकर प्लानिंग और कार्यालयी काम गिने-चुने चेहरों के इर्द-गिर्द सिमटे दिखाई दे रहे हैं। चर्चा का केंद्र वह निजी एजेंसी है, जिसे एमडीए हर महीने करीब 13 लाख रुपये का भुगतान कर रहा है। काम कितना और किस स्तर का हो रहा है, इसे लेकर अंदरखाने असहजता और बाहरखाने सवाल दोनों हैं।
एमडीए ने स्टाफ की कमी का हवाला देते हुए करीब एक साल पहले इस निजी एजेंसी से अनुबंध किया था। अनुबंध के तहत एजेंसी के चार कर्मचारी एमडीए कार्यालय में तैनात हो गए। लैपटाप हाथ में लिए ये कर्मचारी दफ्तर-दफ्तर घूमते नजर आते हैं। आधिकारिक तौर पर इनका मुख्य काम एमडीए बोर्ड बैठक की तैयारी बताया जाता है।
इसके अलावा त्रैमासिक पत्रिका की सामग्री जुटाने, छपाई तक समन्वय करने और आवासीय योजनाओं की प्लानिंग में “तकनीकी सहयोग” देने का दावा भी किया जा रहा है। इतना ही नहीं, नए साल का कैलेंडर प्रकाशित कराने के लिए डाटा जुटाने का काम भी इसी एजेंसी ने किया है।
अधिकारियों का दावा है कि एजेंसी विभिन्न स्तरों पर सहयोग कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये काम 13 लाख रुपये प्रतिमाह को देखते हुए कितना उपयुक्त है। एमडीए के भीतर ही कई लोग दबी जुबान से कहते हैं कि एजेंसी के कर्मचारी अफसरों के कमरों के चक्कर लगाते ज्यादा दिखते हैं, जबकि ठोस आउटपुट जमीन पर नजर नहीं आता।
चर्चा यह भी है कि गोविंदपुरम टाउनशिप के ले-आउट से जुड़े कामों में भी इसी एजेंसी की भूमिका रही है। हालांकि प्लानिंग पूरी इस एजेंसी ने नहीं की है। यही वजह है कि एजेंसी की भूमिका और भुगतान को लेकर पारदर्शिता की मांग उठने लगी है। मामला यहीं खत्म नहीं होता। एमडीए में सड़क निर्माण के ठेकों को लेकर भी सवालों की लिस्ट लंबी है। अधिकांश सड़कें एक ही कंपनी से बनवा रही हैं।
इसके पीछे कारण जो भी हो, दिल्ली रोड को ‘स्मार्ट’ बनाने से लेकर अन्य प्रमुख सड़कों तक, एक बड़े ठेकेदार की भूमिका लगातार सामने आ रही है। इससे यह संदेह गहराता जा रहा है कि निविदा प्रक्रिया में वास्तविक प्रतिस्पर्धा है या फिर पहले से तय फार्मूले के तहत काम बांटे जा रहे हैं। एमडीए की आवासीय योजनाओं में भी काम के नाम पर बार-बार वही चेहरे नजर आने लगे हैं।
कुछ अधिकारी अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए निविदाओं को मनमाफिक ढंग से मोड़ रहे हैं। एमडीए के चीफ इंजीनियर पंकज पांडेय का कहना है कि ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली है। एक एजेंसी एमडीए से जुड़कर काम कर रही है। आवासीय योजनाओं में इसके कर्मचारी सहयोग करते हैं। निविदा प्रक्रिया आनलाइन है। इसमें किसी तरह की हेराफेरी की संभावना बहुत कम है। किसी को कोई शिकायत है तो वह बता सकता है।

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