पानी नहीं जहर पी रहे हापुड़वाले, प्रदूषित काली नदी से 40 गांव तबाह; कैंसर की वजह से हर साल जा रही जान
हापुड़ जिले में दूषित पेयजल एक गंभीर समस्या बन गया है। भूजल में हानिकारक रसायन और जैव तत्व मिलने से टीडीएस खतरनाक स्तर पर है। इसके कारण पेट और लीवर के ...और पढ़ें
स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में
ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। जिले के ज्यादातर क्षेत्रों का पेयजल दूषित है। भूजल में ही हानिकारक रसायन और जैव तत्व मिल रहे हैं। इस कारण से टीडीएस भी खतरनाक स्तर पर है। ऐसे में दूषित पेयजल शरीर में पहुंच रहा है। इससे लीवर व पेट के रोगों के साथ ही कैंसर तक की मार लोगों को झेलनी पड़ रही है।
जिले में एक साल में पेट व लीवर कैंसर के 47 लोगों की मौत हो चुकी है। जिनका मुख्य कारण दूषित पेयजल को माना जा रहा है। वहीं इस समय जिले में सौ से ज्यादा लोग पेट के कैंसर से जूझ रहे हैं। काली नदी के आसपास के ही 40 से ज्यादा गांवों के लोगों को दूषित पेयजल की मार से दोचार होना पड़ रहा है।
इसके साथ ही धौलाना, पिलखुवा, सिंभावली, बहादुरगढ़ व गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्रों में भूजल दूषित है। भूजल में मिल रहे केमिकल और सीवर का प्रभाव पेयजल पर आ रहा है। बार-बार घोषणाओं के बावजूद क्षेत्र में पाइपलाइन पेयजल की सप्लाई आरंभ नहीं हो पा रही है। वहीं एसटीपी का निर्माण भी नहीं हुआ है। वहीं धौलाना क्षेत्र में भी भूजल दूषित निकल रहा है।

| श्रेणी | संख्या / विवरण |
|---|---|
| जिले की कुल आबादी | 24,00,000 |
| पाइपलाइन पेयजल | 10,00,000 |
| दूषित भूजल | 8,00,000 |
| उथले नल | 3,00,000 |
| जर्जर पाइपलाइन | 6,00,000 |
| पेट के कैंसर से मौत | 47 |
| पेट के कैंसर से पीड़ित | 52 |
| आमजन को पेयजल जांच सुविधा | नहीं |
बुलंदशहर रोड पर स्थित 16 सौ की आबादी वाला छोटा सा गांव सादिकपुर। गांव का भूजल दो किमी दूर निकल रहे नाले और तीन किमी दूर होकर निकल रही काली नदी के कारण बेहद दूषित है। इसका प्रभाव यह है कि एक साल में गांव के राजू सिराेही, वीरेंद्र सिंह सिरोही, गगन प्रसाद, सुनीता देवी, पप्पी फौजी, मुननी देवी और भवेंद्र को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी ने लील लिया है।
यह केवल एक गांव सादिकपुर की ही कहानी नहीं है। यह तो जिले के ऐसे संपन्न गांवों में सेे है, जहां पर हर घर का एक व्यक्ति सरकारी नौकरी में है या रहा है। ऐसे में ग्रामीणों ने अपने यहां पर आरओ प्लांट लगवा लिया है। वहां से सभी घरों को पेयजल की सप्लाई की जा रही है।

जिले में दर्जनाें ऐसे सादिकपुर हैं, जहां का पेयजल तो दूषित ही है, लेकिन वहां पर आरओ प्लांट लगाने की स्थिति नहीं है। गांव में कैंपर सप्लाई की भी सुविधा नहीं है। ऐसे में ग्रामीणों को दूषित पेयजल ही पीना पड़ता है। ऐसे में जिले में 52 व्यक्ति पेट के कैंसर से पीड़ित है। लीवर, आंत, किडनी, त्वचा, हड्डी, दांत व त्वचा के रोगियों की संख्या हजारों में है।
धौलाना क्षेत्र के गांव सिरोधन में पिछले ही दिनों 400 से ज्यादा लोग काला पीलिया के शिकार हुए, जिनमें से 10 से ज्यादा की मौत हो गई। सरकारी अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार ही बीमारों की संख्या सैकड़ों में है, जबकि आधे से ज्यादा लोग निजी अस्पतालों में उपचार को पहुंचते हैं। इन सके बावजूद स्वच्छ पेयजल सप्लाई की कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।
यह हैं कारण
पाइपलाइन पेयजल की सप्लाई नहीं होने से जिले की आधी से ज्यादा आबादी दूषित पेयजल पर निर्भर है। भूजल की गुणवत्ता कहीं पर भी मानक के अनुरूप नहीं है।

सबसे ज्यादा प्रदूषित भूजल धीरखेड़ा औरद्योगिक क्षेत्र, रामपुर रोड औद्योगिक क्षेत्र, बुलंदशहर रोड, दिल्ली रोड, पिलखुवा में रिलायंस रोड, धौलाना में गुलावठी रोड और मसूरी रोड औद्योगिक क्षेत्र, सिंभावली में शुगर मिल के नाले के आसपास के गांव, बहादुरगढ़ में एस्केप नहर के आसपास के गांव और काली नदी के आसपास के 40 गांवों की स्थिति ज्यादा खराब है।
गंगा किनारे के दर्जनभर गांवों में हर साल 15 से 20 लोगों की मौत जलजनित बीमारियों के कारण होती है। इनमें सबसे ज्यादा टायफाइड के रोगी हैं।
45 किमी के 40 गांव खतरे की जद में
जिले में काली नदी मेरठ की दिशा से मुदाफरा में प्रवेश करती है। यहां से 45 किमी की दूरी तय करके यह भटैल से आगे बढ़कर बुलंदशहर में प्रवेश कर जाती है। यह जिले में छपकौली, लालपुर, ततारपुर, शिमरौली, बछलौता, सीतादेई, श्यामपुर, गजालपुर, पटना, मुरादपुर, जरौठी, जगारा, बांगड़पुर, सुल्तानपुर, मुदाफरा और भटैल सहित करीब 26 गांवों के आसपास से होकर बहती है।
स्थिति यह है कि काली नदी के दोनों ओर एक-एक किमी की चौड़ाई तक भूजल दूषित हो गया है। ग्रामीण 250 फिट की गहराई तक सबमर्सेबल लगवा रहे हैं। उसके बावजूद पानी पीने योग्य नहीं है।
संबंधित गांवों से विभिन्न संस्थाओं द्वारा एक साल में पानी के 217 सैंपल लिए गए हैं। यह सभी जांच में फेल आए हैं। क्षेत्र के ज्यादातर लोग पानी के कैंपर मंगवाकर पेयजल की पूर्ति कर रहे हैं। उसके बावजूद पशुओं को पिलाने में दूषित पानी ही काम आता है।

सीवर व उद्योग के कारण है सबसे ज्यादा प्रदूषण
शहरों और कस्बों-गांवों में सीवर व नाले खुले में बह रहे हैं। इनमें सीवर की गंदगी के साथ ही सोडा, डीडीटी, बीएचसी और पेट्रोलियम उत्पाद, घरेलू अपशिष्ट आदि भी मिलकर भूजल में चले जाते हैं। यह प्रदूषण संक्रमण का कारण बन रहे हैं। प्रदूषित पेयजल अपने साथ विभिन्न जलजनित वायरस और बैक्टीरिया भी लाता है।
जिम्मेदार बने हैं लापरवाह
पेयजल की गुणवत्ता के लिए शहरी क्षेत्रों में अमृत योजना और ग्रामीण में जल-जीवन मिशन संचालित है। इन दोनों योजनाओं को चलते करीब एक दशक हो चुका है। उसके बावजूद प्रथम चरण का कार्य ही पूरा नहीं हो पाया है।
जिससे शहरी क्षेत्रों में पेयजल, सीवर और एसटीपी का काम अधूरा पड़ा है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में पाइपलाइन पेयजल का सपना अधर में लटका है। जिससे लोगों को दूषित पेयजल का प्रयोग करना पड़ रहा है।
हमने यहां पर की पड़ताल
दैनिक जागरण की टीम ने शहर में काली नदी, शहर के मध्य का नाला और अछेजा नाले के आसपास के क्षेत्रों में पड़ताल की। वहीं सादिकपुर, पिलखुवा में रिलायंस रोड, धौलाना में गुलावठी रोड, बाबूगढ़ में नहर क्षेत्र, सिंभावली में शुगर मिल के नाला क्षेत्र, बहादुरगढ़ में एस्केप नहर के आसपास के क्षेत्र और गढ़मुक्तेश्वर के साथियों ने गंगा किनारे के ग्रामीण क्षेत्रों में पड़ताल की। कहीं पर भी पेयजल पीने योग्न मानक के अनुरूप नहीं पाया गया।
डाॅ. प्रदीप मित्तल के अनुसार दूषित पानी है जानलेवा
- दूषित पानी में बैक्टीरिया, वायरस और पैरासाइट्स होते हैं जिससे दस्त, उल्टी और पानी की कमी का कारण बनते हैं।
- पानी में आर्सेनिक जैसे रसायन से हृदय रोग रोग होने का खतरा रहता है।
- दूषित पानी में सीसा, आर्सेनिक व अन्य रसायन से पेट और ब्लड कैंसर का खतरा रहता है।
- पानी में से हैवी मेटल्स, पेस्टीसाइड्स से एक्जिमा, और त्वचा संक्रमण होता है।
- पेस्टीसाइड्स और हार्मोनल रसायन जैसे रसायन प्रजनन प्रणाली को प्रभावित, जन्मजात विकार उत्पन्न हो सकता है।
- दूषित जल से कालरा, टायफाइड, और अमीबियासिस जैसी बीमारी हो जाती हैं।
- दूषित पानी में हैपेटाइटिस ए और ई, सूजन, पीलिया आदि बीमार हो जाती हैं।
- पानी में पेस्टीसाइड्स, हेवी मेटल्स सीसा व आर्सेनिक और नाइट्रेट्स धीरे-धीरे गुर्दा खराब होने का खतरा पैदा हो जाता है।
मरने को छोड़ दी जनता
डब्ल्यूएचओ के मानक के अनुसार पेयजल का टीडीएस 300 से कम होना चाहिए। जबकि भारतीय मानक 500 से कम का है। उसके बावजूद जिलेभर में सामान्य भूजल का टीडीएस 15 सौ से ज्यादा है। वहीं कई क्षेत्रों में टीडीएस तीन हजार तक पहुंच गया है। ऐसे में जल निगम के अनुसार स्वच्छ पेयजल की सामान्य उपलब्धता नहीं होने पर दो हजार टीडीएस मानक तक के पेयजल को पीना सामान्य माना जा रहा है।
शरीर की सबसे पहली जरूरत स्वच्छ पेयजल है। प्रत्येक व्यक्ति को इसके प्रति गंभीर होने की जरूरत है। पेयजल की गुणवत्ता में कमी का सीधा संबंध व्यक्ति के जीवन से है। किसी भी तरह व्यवस्था करें, हर हाल में पीने का पानी साफ ही प्रयोग करें। अपने पेयजल की समय-समय पर गुणवत्ता जांच भी कराते रहें।
- सुनील कुमार त्यागी- सीएमओ।
जल जीवन मिशन का कार्य बजट आवंटित नहीं होने के कारण रुका हुआ था। डेढ़ साल में अब बजट जारी हुआ है। तत्काल पाइपलाइन पेयजल का कार्य आरंभ किया जा रहा है। हम छह महीने में जिलेभर में स्वच्छ पेयजल की सप्लाई सुचारू करा देंगे। वैसे कहीं पर भी पानी की गुणवत्ता बहुत खराब नहीं है।
- विनय रावत- अधिशासी अभियंता, जल निगम।

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