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    कूड़े के पहाड़ों ने जहरीला किया दिल्ली का पानी, 30% से अधिक आबादी कई दशक से ‘धीमा जहर’ पीने को मजबूर

    Updated: Mon, 05 Jan 2026 07:01 PM (IST)

    दिल्ली के ओखला, गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल साइट्स भूजल को जहरीला बना रहे हैं, जिससे लगभग 30% आबादी को साफ पानी नहीं मिल पा रहा है। पानी में टीडीएस, कैल ...और पढ़ें

    मुहम्मद रईस, दक्षिणी दिल्ली। कूड़े के पहाड़ न केवल एमसीडी के लिए चुनौती हैं, बल्कि धरती और उसकी कोख में संरक्षित जल को भी जहरीला बना रहे हैं। ओखला, गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल साइट्स एवं बवाना में इंजीनियर सैनिटरी लैंडफिल को आस-पास का भूजल दूषित हो चुका है। इसके चलते दिल्ली की लगभग 30 प्रतिशत आबादी तक साफ पानी नहीं पहुंच पा रहा है। 

    कहीं टीडीएस की मात्रा मानक से चार गुना तक अधिक है तो कहीं कैल्शियम, सल्फेट और मैग्नीशियम का स्तर भी मानक से कई गुना ज्यादा। दैनिक जागरण की टीम इन लैंडफिल साइटों के आस-पास के इलाकों में पहुंची। टीम को कहीं सबमर्सिबल पंप से पीले दुर्गंधयुक्त तो कहीं हल्के स्लेटी रंग के पानी की सप्लाई मिली।

    पानी इतना गंदा कि वाटर प्यूरीफायर भी फेल

    पानी इतना गंदा होता है कि वाटर प्यूरीफायर भी फेल है। पीनेके लिए लोग या तो दूर से पानी लाते हैं या खरीदकर पीते हैं। कपड़े या बर्तन धुलने में ही इसका प्रयोग होता है। नहाने पर शरीर में खुजली, त्वचा पर चकत्ते उभरने और बाल झड़ने जैसी समस्या होने लगती है। इंदौर की घटना ने लोगों को डरा दिया है। नहाना तो दूर अब तो लोग बर्तन या सब्जी धुलने से भी कतराने लगे हैं।

    ओखला लैंडफिल साइट के सबसे नजदीक बसा है वीपी सिंह कैंप। करीब चार दशक पुराने इस कैंप की आबादी लगभग सात हजार है। पानी की आपूर्ति के लिए छह बोर हैं। पुल प्रह्लादपुर की ओर ए व डी ब्लाक में चार बोर हैं, वहां पीने के लिए गंगाजल की आपूर्ति भी है। वहीं बी और सी ब्लाक के लोग दो बोर पर निर्भर हैं।

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    पानी से होती है खुजली, झड़ते हैं बाल 

    सुबह-शाम बोर चलने पर पीला और मछली तरह दुर्गंध वाला पानी आता है। यह स्थिति पिछले लगभग आठ वर्षों से बनी हुई है। इसका इस्तेमाल बर्तन व कपड़े धोने में ही किया जाता है। इससे नहाने पर त्वचा पर चकत्ते उभरने, खुजली होने और बाल झड़ने जैसी समस्या होने लगती है। पीने के लिए लोगों को या तो दूर से पानी लाना पड़ता है या खरीदकर पीना पड़ता है।

    स्थानीय निवासियों के मुताबिक शिकायत पर कई बार जल बोर्ड ने यहां के पानी का सैंपल लिया, पर रिपोर्ट में क्या आया, आज तक पता ही नहीं चला। जनप्रतिनिधियों से शिकायतों के बाद पिछले एक वर्ष से जल बोर्ड के टैंकर यहां आने लगे हैं। वह भी कभी दो दिन तो कभी तीन दिन के अंतराल पर आते हैं। बीच में जरूरत पड़े तो खरीदना ही विकल्प रहता है।

    भलस्वा के आस-पास खरीदकर पीना पड़ता है पानी

    भलस्वा लैंडफिल साइट के बगल में बसी श्रद्धानंद काॅलोनी और भलस्वा डेरी क्षेत्र की आबादी का बड़ा हिस्सा पानी खरीद कर पी रहा है। यहां के नल दूषित व दुर्गंध युक्त पानी उगल रहे हैं। नल से दूषित पानी आने की वजह घरों को जाने वाली जलापूर्ति लाइन गंदे पानी से लबालब नालियों से होकर गुजर रही हैं।

    जहां-जहां जलापूर्ति पाइप लाइन क्षतिग्रस्त हैं, वहां से नालियों का गंदा पानी पेयजल आपूर्ति में मिक्स हो जाता है। ऐसे में इंदौर जैसी घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। बोर से मिलने वाला भूजल भी पीने लायक नहीं है। पिछले 12-15 साल से लोग पानी खरीदकर पी रहे हैं, या फिर जल बोर्ड के टैंकर से प्यास बुझा रहे हैं।

    मजबूरन नल व भूमिगत पानी पीने वालों की अक्सर सेहत बिगड़ जाती है। किसी का पेट खराब होता है तो कइयों को त्वचा संबंधी परेशानी झेलनी पड़ती है। लोगों का कहना है कि उन्हें पता है कि कूड़े के पहाड़ के कारण यहां की हवा और पानी खराब हो चुकी है, इसलिए जितना संभव है, भूमिगत व नल के पानी के सेवन से बचते हैं।

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    गाजीपुर लैंडफिल साइट के पास मिली ये स्थिति

    मुल्ला कालोनी, राजवीर कालोनी, कोंडली, गाजीपुर मुर्गा मंडी व मछली मंडी व गाजीपुर डेरी फार्म में दिल्ली जल बोर्ड बोरवेल से पानी की सप्लाई करता है। कई क्षेत्रों में लोगों ने सबमर्सिबल पंप भी लगाए हैं। इन क्षेत्रों में दूषित पानी की समस्या है।

    दूषित पानी पीकर लोगों के पेट में संक्रमण होना यहां आम बात है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पानी में दुर्गंध अधिक रहती है। इस पानी को पीना तो दूर घर के काम में भी इस्तेमाल में नहीं लिया जाता है।

    जींस रंगाई बंद, पर केमिकल का असर अब भी

    पूर्वी दिल्ली के गढ़ी मांडू गांव समेत शिव विहार में कई जींस रंगाई फैक्ट्रियां हुआ करती थीं। केमिकल युक्त पानी को ट्रीट करने की व्यवस्था न होने से ये गड्ढों या भूमिगत स्रोत से रिस कर भूजल को दूषित करती रहीं। केमिकल और हेवी मेटल वाले पानी के सेवन से इन क्षेत्रों में कैंसर जैसी बीमारियां बढ़ने लगीं।

    बाद में कोर्ट के आदेश पर इन इकाइयों को बंद कर दिया गया। लोगों के मुताबिक अब यहां जींस की रंगाई का काम तो बिल्कुल भी बंद है। लेकिन उनके चलते भूजल को जो नुकसान पहुंचा, उसका असर अब भी देखने को मिल रहा है। पानी अभी भी केमिकल युक्त ही आ रहा है। कैंसर के मामले में कमी तो आयी, पर इक्का-दुक्का केस अब भी सामने आ रहे हैं।

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    हेवी मेटल और प्रदूषक तत्वों की मात्रा मानकों से कई गुना ज्यादा

    लैंडफिल साइट्स भलस्वा, गाजीपुर और ओखला के साथ ही बवाना में इंजीनियर सैनिटरी लैंडफिल के पास का भूजल दूषित बना हुआ है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने दिसंबर 2021 में हर लैंडफिल साइट के पास से चार-पांच जगहों से सैंपल लिए थे। रिपोर्ट में टोटल डिजाल्व सालिड्स (टीडीएस), कैल्शियम, सल्फेट और मैग्नीशियम का लेवल तय सीमा से ज्यादा मिला।

    दिल्ली यूनिवर्सिटी के जियोलाजी विभाग के प्रो. शशांक शेखर के मुताबिक इन लैंडफिल साइटों से भूजल में क्या समस्या हुई, इसे जानने के लिए विस्तृत अध्ययन की जरूरत है। वर्षा होने पर कचरों के बीच पानी जमा होता रहता है। इसके साथ मिलकर लीचेट यानी कंसंट्रेटेड केमिकल भूजल में रिसता है। इससे आस-पास के क्षेत्र में भूजल प्रदूषण बढ़ता है।

    ओखला लैंडफिल साइट से आसपास के न्यू फ्रेंड्स काॅलोनी, जामिया नगर, सरिता विहार आदि क्षेत्र, गाजीपुर लैंडफिल साइट के चलते नोएडा के कुछ सेक्टर, खोड़ा, गाजीपुर गांव, कोंडली, मयूर विहार फेज तीन और भलस्वा लैंडफिल साइट के चलते शालीमार बाग, पीतमपुरा, बुराड़ी, संत नगर आदि के भूजल गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ा है।

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    (स्रोत-डीपीसीसी)
    (नोट- मात्रा एमजी/ली. और टीडीएस का मानक 500, सल्फेट का 200 एवं मैंगनीज का 30)


    शायद ही कोई दिन जाता हो जब क्षेत्र में दूषित पानी न आता हो। दिल्ली जल बोर्ड के पानी में कई बार सीवर का पानी मिलकर आता है। इसके चलते पेट में संक्रमण, पेट दर्द व उल्टी की समस्या होती है। ठीक होने में पांच से छह दिन लग जाते हैं। सभी ने अपने घर में वाटर प्यूरीफायर लगाया है।

    - शमशाद, मुल्ला काॅलोनी

    लैंडफिल के चलते भूजल दूषित हो चुका है। बहुत से लोगों ने अपने घरों में सबमर्सिबल लगाया हुआ है। वह उसी दूषित भू-जल को पीकर बीमार पड़ रहे हैं। दांताें में व पेट में दिक्कत होती है। मैं भी इन दोनों बीमारी से पीड़ित हूंं। आस-पास के क्षेत्र में दिल्ली जल बोर्ड के प्लांट की बजाय बोरवेल से ही आपूर्ति होती है।

    -अब्दुल रहमान, मुल्ला काॅलोनी

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    जल बोर्ड की लाइन से आने वाला पानी भी पीने लायक नहीं है, अक्सर काले-पीले रंग का दूषित व बदबूदार पानी आता है। जमीनी पानी के लिए सबमर्सिबल लगाया है, लेकिन यह पानी भी पीने लायक नहीं है। इसलिए 50 रुपये में 40 लीटर पानी की कैन खरीदकर प्यास बुझाते हैं। भूमिगत जल का इस्तेमाल नहाने, बर्तन-कपड़े धोने में इस्तेमाल करते हैं।

    -सुनील कुमार, श्रद्धानंद काॅलोनी, भलस्वा

    संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर की ओर से आने वाली जल बोर्ड की जलापूर्ति लाइन अक्सर क्षतिग्रस्त हो जाती है, इस कारण पूरे क्षेत्र में गंदे पानी की आपूर्ति होती है। क्षेत्र में घरेलू जरूरत में भूमिगत पानी का ज्यादा इस्तेमाल होता है। पीने के लिए पानी खरीदना पड़ता है।

    -इरफान, दुर्गा चौक, भलस्वा डेरी

    करीब आठ वर्ष पहले तक पानी ठीक था। उसके बाद से दुर्गंध के साथ पीला पानी आने लगा। वाटर प्यूरीफायर भी इसे साफ नहीं कर पाता। इससे नहाने पर खुजली और बाल झड़ने जैसी समस्या होने लगती है। इसलिए इस पानी का इस्तेमाल केवल बर्तन व कपड़े धुलने में करते हैं। पीने के लिए हमें बाहर से पानी खरीदना पड़ता है।

    -अमर झा, वीपी सिंह कैंप

    हम लोगों की शिकायत पर अब तक आठ बार जल बोर्ड की टीम सैंपल लेकर जा चुकी है। पानी में क्या है, क्या नहीं, कभी कुछ बताया ही नहीं गया। इस पानी को बर्तन में रख दिया जाता है। जब गंदगी तली में बैठ जाती है, तब ऊपर से पानी निकालकर उससे कपड़े और बर्तन धोते हैं।

    -भगवान देवी, वीपी सिंह कैंप

    यह भी पढ़ें- पलवल में औद्योगिक कचरे से 'जहरीला' हुआ पानी, कैंसर से जूझ रहे लोग और बंजर हो रही जमीन


    हेवी मेटल का शरीर के हर अंग पर दुष्प्रभाव पड़ता है। मैगनींज, कोबाल्ट, क्रोमियम, लेड, मर्करी जैसे हैवी मेटल से लिवर व किडनी डैमेज होने का खतरा रहता है।

    हृदय से संबंधित बीमारियों के साथ ही त्वचा पर चकत्ते भी पड़ सकते हैं। इतनी ही नहीं ये हेवी मेटल मानक से अधिक मात्रा में शरीर में लंबे समय तक पहुंचते रहे तो कैंसर जैसी घातक बीमारी की भी वजह बन सकते हैं। सोडियम की अधिक मात्रा से हाई बीपी की समस्या होती है। पोटैशियम की अधिकता किडनी फंक्शन और हृदय रोग की वजह बनता है।


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    -डॉ. संजय राय, सामुदायिक चिकित्सा विभाग, एम्स

    हालिया अध्ययन सीमित हैं। लैंडफिल साइट से आसपास के क्षेत्र पर क्या असर पड़ा, इसके विस्तृत अध्ययन की जरूरत है, तभी असल समस्या सामने आएगी और एक्शन प्लान भी बनाया जा सकेगा। मेजर आयन में सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, क्लोरायड, बाई कार्बोनेट, सल्फेट का स्तर का अध्ययन जरूरी है। हेवी मेटल स्वास्थ्य के लिए घातक होता है। ऐसे में मैगनींज, कोबाल्ट, क्रोमियम, लेड, मर्करी आदि के स्तर भी जांच होनी चाहिए। वहीं अमोनिया, नाइट्रेट आदि की भी सैंपलिंग जरूरी है।

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    -प्रो. शशांक शेखर