पलवल में औद्योगिक कचरे से 'जहरीला' हुआ पानी, कैंसर से जूझ रहे लोग और बंजर हो रही जमीन
पलवल में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रसायनयुक्त पानी ने आगरा नहर और भूजल को दूषित कर दिया है। इससे लुलवाड़ी, बांसवा जैसे कई गांवों में कैंसर के मा ...और पढ़ें
जागरण टीम, पलवल। इंदौर के भागीरथपुरा में जल बोर्ड की लापरवाही से पीने के पानी में एसटीपी का पानी मिलकर आपूर्ति होने से 15 लोगों की मौत हो गई। वजह-सिस्टम का गैर जिम्मेदाराना रवैया... सरकारी अधिकारियों की कुंभकर्णी नींद और आम जनता को उसके हाल पर छोड़ने की कार्यशैली।
भागीरथपुरा तो खून के आंसू रो रहा है, लेकिन यह केवल स्वच्छता का सिरमौर बनकर पीठ ठोंकने वाले इंदौर की कहानी भर नहीं है। हरियाणा के पलवल जिले में भी इसी तरह लाखों लोग दूषित जल पीने को मजबूर हैं। औद्योगिक क्षेत्र के आसपास गांवों का भूजल दूषित हो चुका है।
आगरा नहर में बह रहे औद्योगिक इकाइयों के रसायनिक पानी के कारण कई गांव के लोग तो दशकों से धीमा जहर ही पी रहे हैं या पीकर जान गंवा चुके हैं। लोग स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों को शिकायत करके थक चुके हैं, लेकिन कोई कारणों की जांच करने को तैयार नहीं। आजतक पानी की जांच तक नहीं कराई गई। लोगों को उनका हाल पर छोड़ दिया गया है।

रसायनयुक्त पानी आसपास गांवों के लिए बन रहा जानलेवा
पलवल जिले में लुलवाड़ी, बांसवा, भिड़ूकी, खिरबी, खांबी, घासेड़ा, अजीजाबाद, चव्वन का नंगला, अमरौली, बाता समेत करीब दर्जनभर गांवों की करीब दो लाख आबादी है। इन गांवों में सैकड़ों ग्रामीणों की कैंसर से मौत हो चुकी है और कई और कैंसर से पीड़ित होने के बाद जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं। इसका मुख्य कारण है आगरा नहर में बहता रसायनयुक्त पानी। गांवों के किसान नहर में बहते इसी रसायन युक्त पानी से खेतों की सिंचाई करते हैं। पीने के पानी के ट्यूबवेल भी नहर के साथ ही लगे हुए हैं।
ग्रामीण स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों को शिकायत करके थक चुके हैं, लेकिन कोई कारणों की जांच करने को तैयार नहीं। आजतक पानी की जांच तक नहीं कराई गई।
2016 में हुई थी बांसवा में कैंसर की पुष्टि
जिले के बांसवा गांव में 2016 में ग्रामीणों में बीमारी फैलने पर स्वास्थ्य विभाग द्वारा जांच कराने पर कैंसर की पुष्टि हुई थी। उस समय दो महीने के अंदर ही कैंसर से 16 लोगों की मौत हो गई थी। स्वास्थ्य विभाग ने इसके फैलने के कारणों का पता लगाया।
इसमें पाया गया कि आगरा कैनाल में आ रहे दूषित पानी से खेतों में हो रही फसलों की सिंचाई मुख्य कारण है। बाद में कृषि विभाग द्वारा प्रयोगशाला में आगरा कैनाल के पानी की जांच कराई गई। जांच में पाया कि नहर में दिल्ली स्थिति औद्योगिक इकाइयों से आ रहे पानी में काफी रासायनिक तत्व हैं। जो सिंचाई के माध्यम से खेतों में फसलों में जाता है और उस अनाज को खाने से लोग कैंसर से ग्रस्त हो रहे हैं।
आगरा नहर दिल्ली कालिदीकुंज के पास से यमुना नदी से निकलती हैं। फरीदाबाद से पलवल होते हुए मथुरा को जाती है। आगरा नहर तो आगरा तक जाते हुए रास्ते में हजारों एकड़ फसल की सिंचाई करती है। नहर में बहता रसायनयुक्त पानी से फसलों को नुकसान होता है। जिसका सीधा स्वास्थ्य पर पड़ता है। आगरा नहर में प्रदूषित पानी डालने की वजह से जिले के लोग परेशान हैं। कैंसर रोगी बढ़ रहे हैं।
किस तरह बढ़ रहे कैंसर के मरीज
गांवों में ज्यादातर पेट, रक्त, रैक्सम, गला, मुंह का कैंसर के मरीज ज्यादा हैं। जिन मरीजों की मौत हो चुकी है, उनमें ज्यादातर पेट, रक्त व रैक्सम से पीड़ित थे।
आगरा नहर में बहते रसायनयुक्त पानी के कारण गांव में पचास से अधिक लोग कैंसर की चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं। करीब 15 साल मेरे पिता पूर्व सरपंच गिर्राज सिह की भी कैंसर से मौत हो गई थी। कई बार अधिकारी से लेकर जनप्रतिनिधि से इस समस्या की शिकायत कर चुके, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। कैंसर से मरने वालों का सिलसिला आज भी जारी है। - राकेश, सरपंच, लुलवाड़ी
करीब तीन साल पहले मेरे पिता सूरजमल की कैंसर से मौत हो गई थी। वह पशु विभाग में काम करते थे। स्वास्थ्य विभाग से लेकर सिंचाई विभाग तक सबसे शिकायत कर चुके। मगर आजतक पानी की जांच तक नहीं हुई। परिवार में किसी को छोटी सी भी बीमारी हो जाती है तो डर लगने लगता है। - सोनू, लुलवाड़ी
खुले में धड़ल्ले से बहाया जा रहा रसायनयुक्त पानी
जिले में पृथला औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाला रसायनयुक्त पानी खुले मैदानों, खेतों, कैनालों, ड्रेनेज व रजवाहों मे धड़ल्ले से बहाया जा रहा रहा है। यह जहरीला पानी फसलों और जमीन में जहर घोल रहा है। यही कारण है कि यमुना नदी के पानी में बायो आक्साइड डिमांड का स्तर दस गुना अधिक तक पहुंच चुका है। इससे भूजल प्रदूषित हो रहा है, साथ ही इस पानी से ही फसलों की सिंचाई भी जोरों से हो रही है, जो आगामी वर्षों में स्वास्थ्य के लिए घातक साबित होने वाला है। लगातार छोड़े जा रहे इस पानी के कारण ऊपरी परत पर रसायन जमने से खेतों ने पानी भी सींचना बंद कर दिया है। बड़ी संख्या में खेतों में पानी खड़ा हुआ है।
जिले से गुरुग्राम, आगरा कैनाल, गोंछी ड्रेन के अलावा अन्य रजवाहों का पानी उजीना ड्रेन के रास्ते यमुना नदी में जाता है। कुछ वर्ष पहले यह जल स्त्रोत किसानों की फसल के लिए वरदान साबित होते थे। किसान यहां से अपने खेत की सिंचाई करते थे और पीने में भी उपयोग करते थे, लेकिन अब जिले और आसपास के जिलों में औद्योगिक क्षेत्र बनने के बाद ज्यादातर औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रसायन युक्त गंदे पानी को कैनाल, रजवाहों और ड्रेन में अवैध तरीके से डाला जा रहा है। खासकर पृथला, मीरापुर, दुधोला, बघोला, देवली, गदपुरी, छपरोला, ततारपुर आदि गांवों में हालत खराब हो रहे हैं।
करीब एक लाख से अधिक की आबादी सीधे तौर पर प्रभावित हो चुकी है। अंधाधुंध तरीके से रसायनयुक्त पानी डालने से जल्द स्त्रोत विषैले हो चुके हैं। इनमें रसायन युक्त पानी के अलावा मल मूत्र और जीव जंतु के शव बहते रहते हैं। कई जगह सीवरेज के पानी को भी रजवाहों में डाला जा रहा है। पानी का रंग पूरी तरह काला हो चुका है।
यह भी पढ़ें- नोएडा वाले पानी में पी रहे 'धीमा जहर', 10 लाख लोगों पर मंडरा रहा खतरा; रिपोर्ट पढ़ हिल जाएगा दिमाग
पानी इतना जहरीला हो चुका है कि कोई व्यक्ति कुछ देर के लिए हाथ डाल दे, तो उसे चर्म रोग हो जाए। हालांकि इस क्षेत्र में भूजल खारा है और गांवों में पेयजल की आपूर्ति भी रेनीवेल के जरिए होती है, लेकिन किसान राजवाहों, ड्रेनों से ही अपने खेतों की सिंचाई भी करते हैं, जिससे फसलों में जहर घुल रहा है और भूजल स्तर भी दूषित हो रहा है। अभी इस क्षेत्र में छोटी बीमारियों से ही लोग ग्रसित होते हैं, लेकिन आगामी वर्षों में यह जहरीला पानी बेहद खतरनाक साबित होने वाला है।
जमीन भी होने लगी खराब
बीते 15 वर्षों से तेजी से हुए औद्योगिकरण के कारण इस क्षेत्र में मौजूद फसलों की पैदावार में भी कमी आने लगी है। लगातार छोड़े जा रहे इस पानी के कारण ऊपरी परत पर रसायन जमने से जमीन ने पानी भी सींचना बंद कर दिया है। बड़ी संख्या में जमीन पर यह पानी खड़ा हुआ है।
मानकों से दस गुना से अधिक प्रदूषित
रसायनयुक्त पानी की वजह से जिले से गुजरने वाली यमुना नदी का पानी निर्धारित मानकों से दस गुना से अधिक प्रदूषित है। यमुना नदी के पानी में बायो आक्साइड डिमांड का स्तर चार मिलीग्राम से कम होना चाहिए, लेकिन यह स्तर 40 मिलीग्राम के करीब पहुंच चुका है। जब नदी या नहरी पानी में बीओडी लेवल तीन मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक हो जाता है, तो वह जलीय जीव जंतुओं के लिए घातक हो जाता है। रसायनयुक्त पानी से कैडमियम, क्रोमियम जैसे धातु भी भूजल स्रोतों में समाहित हो गए हैं। इनकी साफ सफाई करवाना तो दूर प्रदूषण विभाग और जिला प्रशासन अवैध तरीके से डाले जा रहे पानी को रोकने के लिए कई वर्षों से नींद से ही नहीं जागा है।
कैंटरों से खुलेआम डाला जा रहा रसायनयुक्त पानी
इकाइयों से निकलने वाला दूषित पानी सीधा जलस्रोतों में डाला जा रहा है। वहीं जिले में कैटरों के जरिए भी फैक्ट्रियों से निकलने वाला स्सायनयुक्त पानी रजवाहों, ड्रेन और कैनालों में डाला जा रहा है। मीरापुर, पृथला, बघोला, दुधोला में दिनभर रजवाहों, ड्रेनों में प्रतिदिन सैकड़ों कैटरों से स्सायनयुक्त पानी डाला जा रहा है।
हमारे स्तर पर समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। यमुना नदी को साफ कर दिया जाए तो आगरा नहर रसायनयुक्त पानी से साफ हो जाएगी। दूसरा यह भी है कि आगरा नहर में इतना पानी है कि उसको एसटीपी की मदद से शोधित नहीं किया जा सकता है। इसलिए आजतक नहर के पास एसटीपी का निर्माण नहीं किया जा सका। - रियाज अहमद, एसडीओ, सिंचाई विभाग

कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।