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    नोएडा वाले पानी में पी रहे 'धीमा जहर', 10 लाख लोगों पर मंडरा रहा खतरा; रिपोर्ट पढ़ हिल जाएगा दिमाग

    By AJAB SINGHEdited By: Kapil Kumar
    Updated: Mon, 05 Jan 2026 01:38 PM (IST)

    गौतमबुद्ध नगर में 10 लाख से अधिक लोग रसायनों और मल-मूत्र से दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। अवैध डाइंग उद्योग हरनंदी नदी और जमीन में रासायनिक अपशिष्ट छो ...और पढ़ें

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    प्रवेंद्र सिंह/अजब सिंह, नोएडा। नोएडा शहर के नागरिकों की सबसे पहली जरूरत पानी है। गौतमबुद्ध नगर में संबंधित प्राधिकरण इसी जरूरत को पूरा करने में सबसे पीछे हैं। गौतमबुद्ध नगर में 10 लाख से अधिक आबादी पानी में रसायन के साथ मल-मूत्र पीने को मजूबर है। 

    हरनंदी के किनारे बसे दो दर्जन से अधिक गांव और कॉलोनियों में लाखों लोग रोजाना 'धीमा जहर' पी रहे हैं। छजारसी, चोटपुर, यूसुफपुर चक साबेरी, बहलोलपुर, गढ़ी चौखंडी, ककराला, नया गांव, सलारपुर, हाजीपुर समेत समेत अन्य गांवों में 150 से अधिक डाइंग उद्योग अवैध रूप से रसायनिक अपशिष्ट जमीन और हरनंदी में छोड़ रहे ह्रैं। 

    प्राधिकरण की आपूर्ति नाकाफी होने से शत-प्रतिशत आबादी भूजल पर निर्भर है। यह भूजल अब विषैला हो चुका है लेकिन पीना मजबूरी। घरों के पंपों से निकलता पानी रसायनयुक्त होने से कैंसर और टाइफाइड के मरीजों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। जिम्मेदार अधिकारी हर डाइंग उद्योग से महीने के पांच हजार रुपये लेकर उन्हें जहर फैलाने की खुली छूट दे रहे हैं। गौतमबुद्ध नगर की 70 प्रतिशत आबादी आज भी भूजल पर निर्भर है। इंदौर जैसी त्रासदी की दहलीज पर खड़े इन गांवों में अब सवाल उठ रहा है। यहां संचालित उद्योगों में रसायनिक पानी में मिलाकर कपड़ों की रंगाई हो रही है।

    Noida News (6)

    पांच हजार में एक उद्योग की तिकड़ी में हिस्सेदारी

    नोएडा क्षेत्र में पांच डाइंग उद्योग अनुमति से चल रहे हैं। ईटीपी से रसायनिक पानी शुद्ध कर यहां से छोडा जाता है। लेकिन, गांव में बगैर अनुमति के चल रहे उद्योग प्राधिकरण, विद्युत निगम और प्रदूषण बोर्ड की हिस्सेदारी से चल रहे हैं। एक उद्योग से करीब पांच हजार रुपये प्रतिमाह लेकर इस पैसे को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। प्राधिकरण की टीम निरीक्षण नहीं करती। विद्युत निगम की टीम मामला बढ़ने पर कनेक्शन काटती है फिर जोड़ती है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है।

    दुजाना गांव में बढ़ा कैंसर का प्रकोप

    जल प्रदूषित होने से दादरी के दुजाना समेत आसपास के गांवों में कैंसर व हैपेटाइटिस जैसी बीमारियां पिछले एक दशक में रौद्र रूप धारण कर चुकी हैं। आरोप है कि आसपास फैक्ट्रियों के रसायनिक युक्त पानी को चोरी छिपे जमीन के गर्त में डाला जा रहा है। पानी का टीडीएस ही आठ सौ के करीब है। इससे बीमारी पनपी हैं। 20 हजार की आबादी वाले दुजाना गांव में मौजूदा समय में ही कैंसर व हैपेटाइटिस के 60 से अधिक मरीज है। ग्रामीणों का दावा है कि पिछले पिछले दो तीन महीनों में 20 से अधिक मौत हुई।

    मोमनाथल की महिलाओं में बढ़ा गर्भाशय कैंसर

    मोमनाथल गांव में भूजल रसायनिक युक्त होने से महिलाओं में गर्भाशय कैंसर के मामले तेजी से बढी। यह लक्षण कुछ युवतियों में भी नजर आए। इलाज के दौरान बचाव के लिए गर्भाशय कई महिलाओं और युवतियों के निकाले गए। कैंसर और गर्भाशय की अधिक दिक्कत रही। यह मामला तेजी से उठा। गांव तक गंगाजल की पाइपलाइन पहुंचाई गई। घरों-घरों में पानी का कनेक्शन दिया जाने लगा है।

    घर के नलों में मल-मूत्र की गंध

    कॉलोनियों में सीवर व्यवस्था नहीं है। मल-मूत्र नालियों में बहता है। यह नदियों में पहुंचता है या रुकी हुई नालियों से भूगर्म में समा जाता है। भूगर्भ से यह मल-मूत्र घरों में पहुंचता है। लाखों की आबादी इस तरह से पानी पी रही है। शहर में नोएडा प्राधिकरण के 300 बोरवेल हैं। इनसे पूरे शहर में पानी की आपूर्ति होती है। प्राधिकरण की आपूर्ति में भी सीवरयुक्त पानी या गंध की शिकायतें होती हैं।

    उद्योगों से पानी में मिल रहा केमिकल

    डाइंग उद्योगों से एजो डाईज, रिएक्टिव डाईज, डिस्पर्स डाईज, सोडियम क्लोराइड, सोडियम सल्फेट, कास्टिक सोडा, सल्फ्यूरिक/एसिटिक एसिड, क्राेमियम, कापर, जिंक, सर्फेक्टेंट्स, डिटर्जेंट, हाइड्रोजन पेरोक्साइड रसायन पानी के साथ निकलते हैं।

    पानी को इस तरह करते हैं प्रदूषण

    रसायन सूरज की रोशनी को नदी में उतरने से रोकता है। इससे प्रकाश संश्लेषण रुकता है। ऑक्सीजन कम होती है। जलीय जीव मरते हैं। रसायन युक्त पानी भूगर्भ में पहुंचने से नल और पंप से घरों तक पहुंचता है। इंसानों को कैंसर का खतरा बढ़ता है। भूगर्भ में नमक की मात्रा अधिक बढ़ने से हड्डियां खोखली हो जाती हैं।

    प्रतिदिन 75 लाख लीटर पानी में बीमारी का रंग

    डाइंग उद्योगों से प्रतिदिन 75 लाख लीटर रसायनिक पानी निकलकर हरनंदी और जमीन में जाता है। एक उद्योग से प्रतिदिन 50 हजार लीटर पानी निकलता है। 100 से 300 लीटर पानी प्रति एक किलोग्राम फैब्रिक की रंगाई में उपयोग होता है। यह रंगीन पानी पूरी तरह कपड़ों पर नहीं चढ़ पाता है। नालियों और बोरवेल के जरिए पानी को नदी और भूगर्म में उद्योग संचालक मिला रहे हैं।

    पिछले दो तीन महीनों में 20 लोग कैंसर व किडनी जैसी घातक बीमारी की वजह से अपनी जान गवां चुके हैं। मौजूदा समय में 60 से अधिक कैंसर, किडनी व हैपेटाइटिस के मरीज गांव में है। - डॉ. देवेंद्र नागर, दुजाना

    गांव का मौजूदा समय में पानी का टीडीएस आठ सौ है। ज्यादातर घरों में आरओ लगे है। लोग बीमारी से बचने के लिए पानी खरीदकर पीने को मजबूर है। गांव के नाले व नालियों का दूषित पानी भी तालाबों में जमा होता है। - डॉ. भूपेंद्र नागर, दुजाना

    सरकार ने अच्छी पहल करते हुए पानी की टंकी लगवाई, लेकिन टंकी का पानी घर-घर तक नहीं पहुंच पा रहा है। लोग अभी भी सबमर्सिबल व हैंडपंप के पानी पर निर्भर है। - कपिल प्रधान, दुजाना

    10 दिन पूर्व दादी की कैंसर से मौत हुई है। गांव का पानी बहुत ज्यादा प्रदूषित है। आरओ से भी पानी शुद्ध नहीं हो पाता है। डाइंग उद्योगों से प्रदूषित पानी और बढ़ गया है। - सौरभ यादव, गढी चौखंडी

    प्रदूषित पानी से इंसान ही नहीं जानवर भी प्रभावित हो रहे हैं। मवेशियों के गर्भ धारण के बाद समय से पहले बच्चे हो जाते हैं। मवेशियों के बच्चे अंधे और विकलांग होते हैं। - रतनपाल यादव, गढी चौखंडी

    शिकायतों पर हल नहीं होता है। गांव नालियों से पानी के निकासी का इंतजाम नहीं हैं। डाइंग उद्योग एक गली से बंद होते हैं तो दूसरे में शिफ्ट हो जाते हैं। - पुष्पेंद्र यादव, गढी चौखंडी

    टायफाइड तो आए दिन मौजूदा समय में ग्रामीणों की इस तरह की कोई शिकायत नहीं मिली है। यदि ऐसा हैं तो टीम भेजकर पानी की गुणवत्ता जांच के लिए सर्वे कराया जाएगा। - डॉ. शिवाकांत द्विवेदी, सीडीओ गौतमबुद्ध नगर

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    10 वर्ष से छजारसी कालानी में रह रही हूं। दो वर्ष पूर्व कैंसर का पता चला। इलाज चल रहा है। बाहर से बोतलबंद पानी आता है। पानी की गुणवत्ता बहुत खराब है। - बाला देवी, छजारसी कॉलोनी

    पहले 60 फीट नीचे पानी था। अब 300 फीट नीचे हैं। टायफाइड और पेट संबंधी समस्याएं अक्सर रहती हैं। कालोनी में बीते छह माह में 10 से अधिक मौत कैंसर से हुईं हैं। - महीपाल चौधरी, छजारसी कॉलोनी