गोरखपुर BRD में डॉक्टरों ने अपना खून देकर बचाया 14 साल की किशोरी का जीवन, पेट में हो गए थे छह छेद
गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने एक 14 वर्षीय किशोरी की जान बचाई, जो आंत संबंधी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। निजी अस्पताल में बिगड़ चुकी ह ...और पढ़ें

तीसरे चरण के ऑपरेशन के बाद बच्ची के साथ डॉ. अशोक यादव व रेजीडेंट डॉक्टर। जागरण
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने न सिर्फ जटिल सर्जरी कर एक मासूम की जान बचाई, बल्कि जरूरत पड़ने पर स्वयं रक्तदान कर मानवता की मिसाल भी पेश की। बिछिया क्षेत्र की 14 वर्षीय किशोरी एक साल से आंत संबंधी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। निजी अस्पताल में ऑपरेशन के बाद हालत और बिगड़ गई। लेकिन बीआरडी मेडिकल कालेज में सर्जरी विभाग के डाक्टरों की सतत निगरानी, चरणबद्ध आपरेशन और सटीक उपचार से बच्ची अब पूरी तरह स्वस्थ है।
बिछिया के टोला खजुरहिया निवासी प्रमोद राजभर की पुत्री काजल को नवंबर 2024 में उल्टी और पेट दर्द की शिकायत शुरू हुई। एक निजी अस्पताल में जांच के बाद चिकित्सकों ने बताया कि आंत फट गई है और तुरंत आपरेशन करना होगा। स्वजन ने लगभग 45 हजार रुपये खर्च कर सर्जरी करवाई, लेकिन ऑपरेशन के कुछ ही दिनों बाद पेट में छह छेद बन गए और वहां से मल बाहर निकलने लगा।
स्वजन उसे लेकर बीआरडी मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे, जहां सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डाॅ. अशोक यादव ने मामले को चुनौती के रूप में लिया। एक साल के अंदर उपचार के दौरान किशोरी के तीन बड़े ऑपरेशन करने पड़े। इस लंबी चिकित्सा प्रक्रिया में उसे 17 यूनिट रक्त की आवश्यकता पड़ी।
ब्लड बैंक से बिना डोनर के सात यूनिट रक्त उपलब्ध हो गया, जबकि शेष 10 यूनिट रक्त की व्यवस्था सर्जरी विभाग के रेजीडेंट डॉक्टरों व फेकेल्टी ने स्वयं रक्तदान कर की। डाॅ. अशोक यादव का कहना है कि किशोरी की स्थिति बेहद नाजुक थी, ऐसे में समय पर रक्त उपलब्ध कराना जीवनरक्षक साबित हुआ। जब किशोरी मेडिकल काॅलेज पहुंची तो उसका हीमोग्लोबिन मात्र 4.5 ग्राम था।
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जांच में पता चला कि उसको आंत की टीबी थी, जिसकी पहचान किए बिना निजी अस्पताल में सर्जरी कर दी गई थी। इसी कारण आंत में कई फिस्टुला बन गए। इसके बाद सर्जरी विभाग ने टीबी एवं चेस्ट विभाग से परामर्श कर टीबी की दवा शुरू कराई। उसको हर 15 दिन पर भर्ती कर टोटल पैरेंट्रल न्यूट्रिशन (टीपीएन) और एल्बुमिन चढ़ाया गया, क्योंकि सामान्य भोजन से उसे पोषण नहीं मिल पा रहा था। बाजार में एक टीपीएन और एल्बुमिन की कीमत लगभग 15 हजार रुपये है।
उपचार के दौरान कुल 40 टीपीएन और 40 एल्बुमिन चढ़ाए गए, जिनकी अनुमानित कीमत करीब छह लाख है, लेकिन मेडिकल कॉलेज में यह सुविधा उसे निश्शुल्क मिली। डाॅक्टरों ने तीन चरणों में ऑपरेशन कर सभी फिस्टुला बंद किए। पहले चरण में इस साल मार्च में चार फिस्टुला बंद किए गए, जुलाई में शेष दो का ऑपरेशन हुआ। इसके बाद एक नया फिस्टुला बनने पर तीसरे चरण में फिर सर्जरी की गई।

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