Nirjala Ekadashi 2025: क्या है निर्जला एकादशी व्रत का नियम? जिससे खंडित नहीं होगा आपका व्रत
निर्जला एकादशी का व्रत बहुत पावन माना जाता है। इस दिन जल का पूरी तरह से त्याग करना होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। कहा जाता है कि इस एकादशी (Nirjala Ekadashi 2025) का व्रत रखने से सभी यानी 24 एकादशी व्रत रखने का फल मिलता है। साथ ही सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है तो चलिए इस आर्टिकल में इसके व्रत नियम जानते हैं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। निर्जला एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है और जैसा कि नाम इसके नाम से पता चल रहा है, इसमें निर्जला व्रत रखने का विधान है। यह व्रत (Nirjala Ekadashi 2025) सबसे कठिन एकादशी में से एक माना जाता है, इसलिए इसके नियमों का पालन करना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि आपका व्रत खंडित न हो और आपको इसका पूरा फल प्राप्त हो सके, तो चलिए इस दिन से जुड़े नियमों के बारे में जानते हैं।
निर्जला एकादशी 2025 कब है? (Nirjala Ekadashi 2025 Kab Hai?)
हिंदू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 6 जून को रात 2 बजकर 15 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 7 जून को सुबह 4 बजकर 47 मिनट पर होगा। पंचांग गणना के आधार पर 6 जून को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाएगा।
निर्जला एकादशी 2025 व्रत के नियम (Nirjala Ekadashi 2025 Fast Rules)
- अन्न का त्याग - इस दिन किसी भी प्रकार का अनाज पूरी तरह से वर्जित है। कहते हैं कि इसमें फलाहार भी मान्य नहीं है।
- मन पर रखें काबू - व्रत के दौरान मन को शांत और शुद्ध रखना चाहिए। किसी के प्रति बुरे विचार नहीं लाने चाहिए और तीखा बोलने से बचना चाहिए।
- ब्रह्मचर्य - इस व्रत में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और शारीरिक इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए।
- भजन-कीर्तन - इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और कथा सुनना चाहिए। इसके साथ ही इस तिथि पर रात में जागरण करना भी शुभ माना जाता है।
- दान-दक्षिणा - द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करें। पारण से पहले जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा दें और पूजा करें।
- क्रोध से बचें - व्रत के दौरान क्रोध और लोभ जैसे - नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
व्रत के लाभ (Nirjala Ekadashi 2025 Fast Benefits)
निर्जला एकादशी का व्रत बेहद पुण्यदायी माना जाता है और इसे सभी एकादशी में से श्रेष्ठ माना जाता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं, क्योंकि मान्यता है कि भीम ने इसी व्रत का पालन करके सभी एकादशी का पुण्य प्राप्त किया था।
ऐसा माना जाता है कि इस व्रत का भाव के साथ पालन करने से भगवान विष्णु की कृपा मिलती है। साथ ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
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