गीता के ये 2 श्लोक बदल देंगे जीवन को देखने का नजरिया, कठिन समय में मन शांत करने का यह है अचूक महामंत्र
श्रीमद्भगवद्गीता जीवन के हर संघर्ष को सुलझाने और सही दिशा देने वाला पवित्र ग्रंथ है। यह लेख गीता के दो ...और पढ़ें

गीता के इन श्लोक से मिलेगी जीवन में सही राह (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में श्रीमद्भगवद्गीता एक अत्यंत पवित्र ग्रंथ है। यह धार्मिक ग्रंथ लोगों के जीवन के हर संघर्ष को सुलझाने, कर्म और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इससे जीवन में सही दिशा प्राप्त होती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि महाभारत काल के दौरान कुरुक्षेत्र में युद्ध की शुरुआत होने से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह दिव्य ज्ञान दिया था।
इस ग्रंथ के श्लोकों का विशेष महत्व है, जिनके द्वारा जीवन में सही मार्गदर्शन प्राप्त होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में बताया गया है कि निष्काम कर्म ही आत्मा को संसार के बंधनों से मुक्त करता है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में हम आपको श्रीमद्भगवद्गीता के 2 ऐसे श्लोकों के बारे में बताएंगे, जिनका पाठ करने से मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का 20वां श्लोक)
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यह आत्मा न तो कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। न ही यह आत्मा किसी काल में जन्म लेकर पुनः उत्पन्न होने वाली है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर का विनाश होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।
यह श्लोक क्या सिखाता है?
जीवन में इसका सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह हमें सिखाता है कि हमारी आत्मा अमर, अजन्मी और शाश्वत है, नष्ट केवल शरीर होता है। यह ज्ञान हमें कठिन परिस्थितियों में शोक और मोह से निकालकर निडर, सकारात्मक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता के 9वें अध्याय का 34वां श्लोक)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मुझमें अपने मन को लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। अपने मन को पूरी तरह मुझे समर्पित करने से तुम निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त करोगे।
यह श्लोक क्या सिखाता है?
श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक जीवन में आने वाले तनाव और भटकाव से छुटकारा पाने की कला सिखाता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि व्यर्थ की चिंताओं से ध्यान हटाकर ईश्वर पर केंद्रित करें। जीवन के हर एक कर्म को प्रभु की पूजा समझकर ईमानदारी से करें। अपना अहंकार त्यागकर जब हम सब कुछ परम सत्ता को समर्पित करते हैं, तो मन को सच्ची शांति प्राप्त होती है।
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