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न जीत का घमंड, न हार का गम! श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक सिखाता है जीवन का असली मंत्र

Published: Mon, 12 Oct 2026 08:00 AM (IST)

श्रीमद्भगवद्गीता का श्लोक सिखाता है कि जीवन में सफलता और असफलता दोनों परिस्थितियों में मन को शांत और स्थिर रखना ...और पढ़ें

गीता का यह श्लोक सिखाता है सफलता-असफलता में समभाव का मंत्र (Picture Credit: AI Generated)

गीता का यह श्लोक सिखाता है सफलता-असफलता में समभाव का मंत्र (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. गीता का श्लोक 2.48 सिखाता है समत्व योग।

  2. सफलता पर घमंड न करें, असफलता से सीखें।

  3. निष्काम कर्म से मन को शांत और स्थिर रखें।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर देखा जाता है कि जब भी मनुष्य को जीवन में सफलता मिलती है वह अहंकार में चूर हो जाता है। यही नहीं कई बार सफलता का घमंड उसके ऊपर इतना चढ़ जाता है कि वह अपने आगे किसी को भी कुछ नहीं समझता है।

वहीं असफलता व्यक्ति को भीतर से तोड़ देती है और वह निराश होकर यह मान लेता है कि जीवन बेकार है और ऐसे जीवन का कोई अर्थ ही नहीं है। वहीं क्या आपने कभी सोचा है कि अगर जीत और हार दोनों परिस्थितियों में मन को स्थित और शांत रखा जाए तो क्या हो।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी जीवन दर्शन को समझाया है। गीता में श्री कृष्ण अर्जुन को ऐसे कई उपदेश देते हैं जो आज भी किसी व्यक्ति के जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। आइए आपको बताते हैं गीता का कौन सा श्लोक है जो व्यक्ति को जीत के घमंड और हार के गम दोनों परिस्थितियों में एक समान रहने की सीख प्रदान करता है।

हर परिस्थिति में समान रहना सिखाता है गीता का यह श्लोक

यह गीता के अध्याय 2 का श्लोक 48 है जिसमें श्रीकृष्ण ऐसा संदेश देते हैं, जो आज भी हर व्यक्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥

इस श्लोक का अर्थ: हे धनंजय! आसक्ति और संगदोष को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में सामान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर। कौन सा कर्म? निष्काम कर्म कर। 'समत्व योग उच्चयते' यह समत्व भाव ही योग कहलाता है।

श्लोक का जीवन में महत्व

अपने कर्तव्यों का पालन करो। सफलता और असफलता, दोनों में समान भाव रखो। मन की इसी समता से हमेशा प्रसन्न रखने की कुशलता मिलती है। समत्व भाव अर्थात सिद्धि और असतिद्धि में समभाव ही योग है। जिसको सिद्धि और असिद्धि विचलित नहीं कर पाती है।

कामनाओं का सर्वथा त्याग है, इसलिए इसे निष्काम कर्मयोग कहते हैं। परमात्मा से मेल कराता है, इसलिए इसका नाम योग अर्थात मेल है। इसमें बौद्धिक स्तर पर ध्यान रखना पड़ता है कि सिद्धि और असिद्धि में समभाव रहे, आसक्ति न हो, फल की वासना न आने पाए इसलिए यही निष्काम कर्मयोग बुद्धियोग भी कहा जाता है।

क्या सिखाता है गीता का यह श्लोक?

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से बताते हैं कि व्यक्ति को हमेशा सिर्फ अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए सफलता या असफलता तो ईश्वर के हाथों में है। जीवन में यदि सफलता आए तो उस पर घमंड नहीं करना चाहिए और यदि असफलता आती है, तो उस पर घबराकर यह मान लेना कि सब कुछ खत्म हो गया, ठीक नहीं होता है। कर्म अपर ध्यान देना जरूरी है परिणाम पर नहीं।

श्रीकृष्ण बताते हैं कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, व्यक्ति को अपना संतुलन बनाए रखना चाहिए। जीत मिलने पर विनम्र रहें और हार मिलने पर उससे सीख लेकर आगे बढ़ें। यही सोच व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत बनाती है।

अगर आप भी सफलता और असफलता में समभाव बनाए रखते हैं, तो निश्चय ही कभी न कभी आपको कर्मों का शुभ फल मिलेगा और ईश्वर की कृपा बनी रहेगी।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।