घोर निराशा में भी जगा देंगे नई उम्मीद! जब अकेले पड़ जाएं तो याद करें भगवत गीता के ये 3 श्लोक
जीवन में कई बार ऐसे हालात आते हैं, जब इंसान खुद को अकेला और निराश महसूस करने लगता है। ऐसे ...और पढ़ें

जब मन हो निराश याद करें भगवत गीता के ये श्लोक (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
आत्म-निर्भरता और कर्मों पर विश्वास से उत्थान करें।
ईश्वर की शरण में जाने से सभी पापों से मुक्ति।
दूसरों के व्यवहार से विचलित न होकर शांत रहें।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवद गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें श्री कृष्ण अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में सफल होने के कई सूत्र बताते हैं। इस ग्रंथ की शुरुआत दिखाती है कि अर्जुन युद्ध के मैदान में निराश दिखाई दे रहे हैं, युद्ध भूमि में जो भी योद्धा मौजूद हैं वो उनके परिवार के लोग ही हैं।
ऐसे में अर्जुन खुद को असमंजस की स्थिति में देखते हैं और श्री कृष्ण के सामने अपनी असमर्थता दिखाते हुए कहते हैं कि ऐसे युद्ध को भला जीतने से क्या होगा जिसमें अपनों की ही मृत्यु होगी। अर्जुन कुछ भी करने में खुद को असमर्थ महसूस कर रहे हैं और उसी समय श्री कृष्ण उन्हें गीता का उपदेश देना शुरू करते हैं।
गीता ग्रंथ में अर्जुन को समझाते हुए श्री कृष्ण ने ऐसी बातें बताई हैं जो आज के लोगों के लिए भी प्रासंगिक हैं। ऐसे ही कुछ श्लोक बताते हैं कि जब व्यक्ति के जीवन में घोर निराशा अपना स्थान बना ले और वो खुद को अकेला महसूस करे , तो उसे क्या करना चाहिए। आइए जानें उन श्लोकों के बारे में जो कठिन समय में बाहर निकलने की शक्ति देंगे।
अपने मन और कर्मों से आगे बढ़ो
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 6 का पांचवां श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है और ये एक ऐसा श्लोक है जो आपको संकट के समय में जब कोई साथ न दे तब इससे बाहर निकलने में मदद करेगा। वह श्लोक है-
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।
भावार्थ: इस श्लोक का अर्थ है कि मनुष्य को अपने मन और कर्मों पर ही विश्वास करना चाहिए और इन्हीं से अपना उत्थान करना चाहिए।
अगर आप संकट में हैं और किसी भी वजह से खुद को निराश पा रहे हैं, तो स्वयं को निराश करने के बजाय मन और कर्मों का उद्धार करना जरूरी है। मनुष्य को अपने मन और कर्मों के माध्यम से खुद को उन्नत करना चाहिए, न कि खुद का पतन होने देना चाहिए।
यह श्लोक इस बात की प्रेरणा देता है कि व्यक्ति अपने पतन और उत्थान के लिए स्वयं ही जिम्मेदार होता है और जब भी कठिन परिस्थिति आने पर किसी का साथ न मिले, तो आपको घबराने के बजाय अपने कर्मों पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। ऐसे व्यक्ति का साथ भगवान कृष्ण स्वयं देते हैं और उसे किसी भी परेशानी से बाहर निकलने में मदद करते हैं।
स्वयं को मुझे सौंप दो
गीता का एक ऐसा श्लोक है जो आपको किसी भी परेशानी से निकलने में मदद करेगा और स्वयं श्री कृष्ण आपकी हर समस्या का समाधान करेंगे। यह श्रीमद्भागवत गीता के अठारहवें अध्याय का 66वां श्लोक है जो आपको किसी भी समस्या से बाहर निकलेगा और आप खुद को प्रभु की शरण में पाएंगे।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ: इस श्लोक का मतलब है कि सभी प्रकार के धर्मों का परित्याग करके केवल मेरी शरण ग्रहण कर लो। मैं तुम्हें समस्त पाप कर्मों से मुक्त करके मोक्ष तक ले जाऊंगा।
यह श्लोक बताता है कि ईश्वर की इच्छा के सामने पूरी तरह से खुद को सौंप देना चाहिए। जब हम अनगिनत नियमों और रास्तों को लेकर उलझन में होते हैं, तो श्री कृष्ण बस एक ही बात कहते हैं कि 'सबकुछ छोड़कर मेरे पास आ जाओ' । खुद को मुझमें सौंप देना कमजोरी नहीं है बल्कि बड़ी से बड़ी समस्या का एक मात्र समाधान है।
दूसरों के व्यवहार से न हों विचलित
श्री कृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 12 में श्लोक 15 में बताते हैं कि मनुष्य को कभी दूसरों के व्यवहार से विचलित न होते हुए स्वयं आगे बढ़ना चाहिए।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।
भावार्थ: जिससे कोई भी प्राणी विचलित नहीं होता और वे जो स्वयं भी किसी की बातों से विचलित नहीं होता है। जो सुख-दुःख में समभाव रहता है और भय और चिंता मुक्त रहता है ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय होता है।
श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से बताते हैं कि किसी को न ही परेशान करना चाहिए और न किसी से परेशान होना चाहिए। जो भक्त ऐसा करता है मैं हमेशा उसके साथ रहता हूं। अगर ऐसा व्यक्ति स्वयं को अकेला महसूस करता है, तो उसे मेरा ध्यान करना चाहिए। मैं उसके आस-पास ही मौजूद हूं।
यदि मनुष्य परेशानी के समय में गीता के इन श्लोकों का पाठ करेगा, तो उसे जल्द ही समस्याओं से बाहर निकलने में मदद मिल सकती है और वो स्वयं को कभी अकेला महसूस नहीं करेगा।
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