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जिंदगी आउट ऑफ कंट्रोल लग रही है? भगवद्गीता के इन 2 श्लोकों में छिपा है मन को शांत करने का राज

Published: Tue, 13 Oct 2026 08:00 AM (GMT+05:30)

भगवद्गीता जीवन की आंतरिक समस्याओं और चंचल मन को काबू में करने के लिए प्रभावी समाधान प्रदान करती है। दो ...और पढ़ें

भगवद्गीता में मानसिक शांति के उपाय (Picture Credits- AI Images)

भगवद्गीता में मानसिक शांति के उपाय (Picture Credits- AI Images)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र धार्मिक ग्रंथ भगवद्गीता में जीवन से जुड़ी प्रत्येक समस्या का समाधान है। आज की तेजी से बदलती हुई दुनिया में अधिकतर लोग अंदरूनी लड़ाइयां ही लड़ रहे हैं। इच्छाएं हमें एक ओर खींचती हैं और नापसंदगी दूसरी ओर भले ही लोग दावा करते रहे कि उनकी जिंदगी पर उनका कंट्रोल है, लेकिन अगर हम उन्हें गौर से देखें तो समझ जाएंगे कि सच्चाई उनके कहे से काफी अलग है।

यही कारण है कि भगवान कृष्ण की प्रभावी शिक्षाओं का महत्व लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस लेख के माध्यम से हम भगवद्गीता से जुड़ी दो ऐसी असरदार सीख जानेंगे जो जीवन की सबसे मुश्किल परिस्थितियों में भी मन को संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।

आंतरिक संतुलन के लिए भगवद्गीता का खास श्लोक, अध्याय 6 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि-

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

मतलब- चंचल और अस्थिर मन जहां भी भटकता है, उसे धीरे-धीरे वापस लाकर आत्मा को काबू में लाना चाहिए।

एक आम व्यक्ति के मन का स्वभाव लगातार सोचते रहने और हलचल करते रहना है। चेतना हमेशा एक विचार से दूसरे विचार या एक भावना से दूसरी भावना की ओर घूमती रहती है। काफी लोग मन की पूरी शांति का अनुभव किए बिना ही जीकर मर जाते हैं।

भगवद्गीता की महान शिक्षाओं के जरिए से भगवान श्रीकृ्ष्ण हमें सही दिशा और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। जो हमारे लिए मोक्ष के द्वार खोलने का काम करती है।

इसलिए, अगली बार जब आपको ऐसा लगे कि आपका मन फालतू इच्छाओं या नफरत की ओर जा रहा है, तो सावधान हो जाएं। उन विचारों पर किसी भी तरह से प्रतिक्रिया न दें। फिर, शांति से अपना ध्यान उस काम पर वापस लाएं जिसे आप कर रहे हैं। माइंडफुलनेस (सजगता) पहला कदम है। असल में ध्यान योग नाम के अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने मन पर जीत हासिल करने के लिए ध्यान की एक तकनीक बताई है। आइए इस अध्याय के एक महत्वपूर्ण श्लोक को देखें और समझें।

भगवान कृष्ण का ध्यान के बारे में उपदेश

भगवद्गीता के ध्यान योग अध्याय में, भगवान श्रीकृष्ण ध्यान को इस तरह परिभाषित करते हैं कि,

तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा यत्चित्तेन्द्रियक्रिय: |

उपविषयासने युञ्ज्यौद्योगमात्मविशुद्धये || 12||

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर: |

सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोक्यन् || 13||

मतलब-उस पर दृढ़ता से बैठकर योगी को सभी विचारों और मन में चलने वाली संपूर्ण गतिविधियों को काबू में करते हुए एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके मन को शुद्ध करने की कोशिश करनी चाहिए। उसे शरीर, गर्दन और सिर को एक सीधी रेखा में मजबूती से पकड़ना चाहिए और नाक की नोक पर ध्यान देना चाहिए बिना आंखों को इधर-उधर भटकने दिए बिना।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।