श्रीमद्भगवद्गीता: क्यों खास हैं गीता के ये 6 अध्याय? इसे सुनने मात्र से बदल जाती है आपकी सोच
भगवद गीता के अध्याय 7 से 12 में छिपे हैं जीवन, मृत्यु, माया और ईश्वर से जुड़े गहरे रहस्य। जानिए ...और पढ़ें

क्या आपने पढ़े हैं गीता के ये अध्याय? (AI-Generated Image)
HighLights
अध्याय 7 और 8 माया और मृत्यु के सत्य को समझाते हैं
अध्याय 9 बताता है कि भगवान भाव के भूखे होते हैं
अध्याय 10 और 11 ईश्वर के विराट स्वरूप का दर्शन कराते हैं
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जब भी मन अशांत हो या जीवन में कोई रास्ता समझ न आए, तो भगवद गीता हमेशा ही हमें सही दिशा दिखाने का काम करती है। खासतौर पर गीता के कुछ अध्याय हमें जीवन बदलने तक के संदेश देते हैं। अगर आप अध्याय 7 से लेकर 12 तक पढ़ें, तो उसमें ऐसा अद्भुत ज्ञान छिपा है, जिसे सिर्फ समझ लेने भर से इंसान की सोच पूरी तरह से बदल सकती है। आइए, इन अध्यायों के मूल संदेश को समझते हैं।
माया का खेल और अंतिम समय (अध्याय 7 और 8)
सातवें अध्याय (ज्ञान-विज्ञान योग) में श्रीकृष्ण समझाते हैं कि यह दुनिया उनकी रची हुई एक 'माया' है। इस भ्रम के जाल से निकलना बेहद कठिन है, लेकिन जो सच्चे मन से ईश्वर की शरण में चला जाता है, वह इस माया से मुक्त हो जाता है।
वहीं आठवां अध्याय (अक्षरब्रह्म योग) जीवन के सबसे बड़े सच यानी मृत्यु के बारे में है। इंसान जीवन भर जिन बातों की चिंता करता है, मरते समय भी वही विचार उसके मन में आते हैं और उसी से उसकी आगे की गति तय होती है। इसलिए हमेशा ईश्वर का स्मरण करते रहना चाहिए, ताकि अंत समय में भगवान की ही प्राप्ति हो।
क्या कहता है 9वां अध्याय?
नौवें अध्याय (राजविद्या राजगुह्य योग) में बताया गया है कि भगवान किसी दिखावे के नहीं, बल्कि आपके भाव के भूखे हैं। अगर कोई प्यार से उन्हें महज एक पत्ता, फूल, फल या थोड़ा सा जल भी चढ़ा दे, तो वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। इंसान जो भी दान, तप या कर्म करे, वह सब ईश्वर को सौंपकर करना चाहिए।
अध्याय 10 और 11 आपको ईश्वर का विराट स्वरूप समझाएगा
भगवान की शक्तियों का अंदाजा ग्यारहवें अध्याय (विश्वरूप दर्शन योग) से लगता है। यहां श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना वो ब्रह्मांडीय रूप दिखाया, जिसमें पूरी की पूरी सृष्टि समाई हुई थी। वहीं, दसवें अध्याय (विभूति योग) में बताया गया है कि इस दुनिया में जो भी मौजूद है, वो भगवान का ही अंश है। उनकी विभूतियों का कोई अंत नहीं है और यह पूरा संसार उनकी शक्ति के एक छोटे से हिस्से पर टिका है।
बारहवें अध्याय में पढ़ें क्या है भक्ति योग?
अक्सर हम सोचते हैं कि भगवान की पूजा का सही तरीका क्या है। बारहवें अध्याय (भक्ति योग) में श्रीकृष्ण कहते हैं कि निराकार (बिना रूप वाले) ईश्वर का ध्यान करना आम इंसान के लिए बहुत मुश्किल है। इसलिए, भगवान को एक रूप में मानकर सच्ची श्रद्धा से उनकी उपासना करना सबसे अच्छा है। जो इंसान सुख-दुख में एक समान रहता है, किसी से द्वेष नहीं करता, सबका भला चाहता है और अहंकार से दूर रहता है, वह भगवान को सबसे ज्यादा प्रिय है।
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