Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    Sawan 2025: यहां जानें देवों के देव महादेव के द्वादश ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कथा एवं महत्वपूर्ण बातें

    Updated: Tue, 08 Jul 2025 04:59 PM (IST)

    वैदिक पंचांग के अनुसार सावन (Sawan 2025) की शुरुआत 11 जुलाई से हो रही है। इस दौरान महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शनों के लिए अधिक संख्या ने भक्त पहुंचते हैं। सनातन धर्म में इन ज्योतिर्लिंगों का खास महत्व है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में जानते हैं इन ज्योतिर्लिंगों की महिमा के बारे में।

    Hero Image
    भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का धार्मिक महत्व

    आनंद सागर पाठक, एस्ट्रोपत्री। Sawan 2025: ‘ज्योतिर्लिंग’ शब्द दो संस्कृत शब्दों से बना है ‘ज्योति’ यानी प्रकाश और ‘लिंग’ यानी भगवान शिव (Lord shiva) का प्रतीक। धार्मिक कथाओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव ने स्वयं को अनंत प्रकाश के स्तंभ के रूप में प्रकट किया था। यह स्तंभ न प्रारंभ था, न ही अंत; यह पूरी तरह से अनादि और अनंत था। उन्होंने यह रूप ब्रह्मा और विष्णु के बीच हो रहे विवाद को शांत करने के लिए प्रकट किया था।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    हालांकि, कुल 64 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख मिलता है, लेकिन बारह ज्योतिर्लिंगों को विशेष रूप से पवित्र और पूजनीय माना गया है। इनका विस्तार से वर्णन शिव पुराण में भी किया गया है।

    इन बारह ज्योतिर्लिंगों को भगवान शिव की असीम और निराकार शक्ति का साक्षात रूप माना जाता है। ये स्थल ऐसे माने जाते हैं जहां धरती और शिव तत्व के बीच की दूरी अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है, जिससे भक्तों को सीधे भगवान महादेव (12 Jyotirlingas katha) से जुड़ने का दिव्य अनुभव हो सकता है।

    बारह ज्योतिर्लिंग और उनकी महिमा

    1) सोमनाथ (गुजरात)– यह प्रथम ज्योतिर्लिंग (Somnath Jyotirlinga) भगवान शिव के सनातन और अविनाशी स्वरूप का प्रतीक है। कई बार विध्वंस के बाद भी इसका पुनर्निर्माण हुआ, जो अडिग श्रद्धा और दिव्य दृढ़ता का प्रतीक बन गया है।

    2) मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश)– दूसरा ज्योतिर्लिंग, श्री शैला पर्वत पर स्थित है। मान्यता है कि यहां शिव और पार्वती जी एक साथ निवास करते हैं। यह स्थल दिव्य प्रेम, एकता और करुणा का सुंदर प्रतीक है।

    3) महाकालेश्वर (उज्जैन, मध्य प्रदेश)– यह तीसरा ज्योतिर्लिंग (Mahakaleshwar Jyotirlinga) अपने दक्षिणमुखी लिंग के लिए प्रसिद्ध है। यह शिवलिंग अकाल मृत्यु से रक्षा और जीवन सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।

    4) ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश)– चौथा ज्योतिर्लिंग एक ऐसे पवित्र द्वीप पर स्थित है, जिसका आकार ‘ॐ’ चिन्ह जैसा है। यह स्थान ध्वनि, सृष्टि और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।

    5) केदारनाथ (उत्तराखंड)– पांचवां ज्योतिर्लिंग, हिमालय की ऊँचाइयों पर स्थित है। यह मंदिर न केवल आध्यात्मिक रूप से गहन है, बल्कि वहां तक पहुंचना भी एक भक्ति और साहस की परीक्षा जैसा है।

    6) भीमाशंकर (महाराष्ट्र)– छठा ज्योतिर्लिंग, राक्षस भीमा के वध से जुड़ा है। इसे अशुभ और बुरी शक्तियों से रक्षा करने वाले रूप में पूजा जाता है।

    7) काशी विश्वनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)– सातवां और सबसे प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग। ऐसा माना जाता है कि यहीं भगवान शिव आत्मा को मोक्ष प्रदान करते हैं। यह मंदिर जीवन और मृत्यु के रहस्यों से परे मुक्ति का प्रतीक है।

    8) त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र)– आठवां ज्योतिर्लिंग, जहां से पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम होता है। यह स्थान मोक्ष प्राप्ति के लिए किए जाने वाले विशेष अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध है।

    9) वैद्यनाथ (झारखंड)– नौवां ज्योतिर्लिंग, यहां भगवान शिव को दैवी चिकित्सक के रूप में पूजा जाता है। वे शारीरिक और आत्मिक रोगों को दूर करने वाले माने जाते हैं।

    10) नागेश्वर (गुजरात)– दसवां ज्योतिर्लिंग, जो विष और बुराई से सुरक्षा के लिए प्रसिद्ध है। यह निर्भयता, शक्ति और संरक्षण का प्रतीक है।

    11) रामनाथस्वामी (रामेश्वरम्, तमिलनाडु)– ग्यारहवां ज्योतिर्लिंग रामायण से जुड़ा है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने रावण वध के बाद प्रायश्चित स्वरूप यहां शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी।

    12) घृष्णेश्वर (औरंगाबाद, महाराष्ट्र)– बारहवां और सबसे छोटा ज्योतिर्लिंग, जो प्रसिद्ध एलोरा गुफाओं के पास स्थित है। यह पुनर्जन्म, करुणा और आध्यात्मिक पुनरुत्थान का प्रतीक माना जाता है।

    यह भी पढ़ें- Trimbakeshwar Jyotirlinga की पूजा करने से कालसर्प दोष होता है दूर, पढ़ें पौराणिक कथा

    आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव

    ये ज्योतिर्लिंग प्राचीन ज्ञान, गहरी श्रद्धा और दिव्यता के जीवंत प्रतीक हैं। प्रत्येक मंदिर न केवल ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को भी दर्शाता है। ये सभी मिलकर भारत की आध्यात्मिक विविधता की सुंदर झलक प्रस्तुत करते हैं।

    महाशिवरात्रि, सावन के सोमवार और अन्य शिव-पर्वों पर इन ज्योतिर्लिंगों की पूजा और यात्रा को अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। भक्तजन श्रद्धा पूर्वक जल, दूध, शहद और बिल्वपत्र अर्पित करते हैं और "ॐ नमः शिवाय" का जाप करते हुए स्वयं को भगवान शिव की ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ने का प्रयास करते हैं।

    श्रद्धा और भक्ति की यात्रा

    सभी बारह ज्योतिर्लिंगों की तीर्थयात्रा को ज्योतिर्लिंग यात्रा कहा जाता है। यह सिर्फ़ एक भौतिक यात्रा नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक रूपांतरण की प्रक्रिया होती है। जहां शरीर की सहनशक्ति और आत्मा की भक्ति, दोनों की परीक्षा ली जाती है।

    ये पावन स्थल हमें यह स्मरण कराते हैं कि भगवान शिव भारत के हर कोने में विद्यमान हैं। केदारनाथ की हिमाच्छादित चोटियों से लेकर रामेश्वरम् के शांत सागर-तट तक। ये धाम आत्मबोध, शांति और मोक्ष की ओर ले जाने वाले प्रकाश स्तंभ की तरह हैं, जो हर साधक को आध्यात्मिक पूर्णता की राह दिखाते हैं।

    यह भी पढ़ें- Somnath Temple: चमत्कारों और रहस्यों से भरा है यह ज्योतिर्लिंग, जानिए इससे जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

    लेखक: आनंद सागर पाठक, Astropatri.com प्रतिक्रिया देने के लिए संपर्क करें: hello@astropatri.com